शनिवार, 25 जनवरी 2014

खो गया सुर हमारा-तुम्हारा..

पिछले दिनों एक बहुत ही लोकप्रिय देश भक्ति गीत का रीमेक किया गया। जिसे बनाने और उसके प्रचार में पैसे की धारा को बेरोक-टोक बहाया गया। वो गीत था “मिले सुर मेरा तुम्हारा”। इस बार इस गीत में फ्यूज़न संगीत, खेल और फिल्म जगत के बेहतरीन सितारे और एक से एक ख़ूबसूरत पर्यटन स्थलों की नुमाइश के बावजूद पुरानी पीढ़ी ने इस गीत को देख के कहा कि ओल्ड इज गोल्ड और नयी पीढ़ी केलिए ये गीत आया राम गया राम से ज़यादा कुछ साबित नहीं हुआ। यानि हर एक मसाले का प्रयोग करके भी पकवान फीका रहा।
यही हाल वर्तमान दौर में बनी देशभक्ति की फिल्मों का भी है।देशभक्ति की फिल्मों की जो सौगात मनोज कुमार ने दी वैसा उपहार कई राज कुमार संतोषी, गुड्डू धनोआ या अनिल शर्मा जैसे फिल्म इंडस्ट्री के दिग्गज मिलके भी के भी नहीं दे पाए। मुझे याद है २००२ में शहीद भगत सिंह की कहानी पर एकसाथ करीब आधा दर्जन फिल्में बनी थी और वो सभी फिल्में मिलकर छ दिन भी लोगों के दिल में भगत सिंह या देश के प्रति कोई भावना पैदा नहीं कर सकी थीं।
आखिर ये देशभक्ति या देशप्रेम क्या होता है?? जिस तरह प्यार, गुस्सा, लोभ, अहंकार, दुश्मनी ये गुण, अवगुण या भावनाए इंसान को उसके असली व्यक्तित्व से ऊपर उठाने या निचे गिराने का कारण होती हैं उसी तरह देशभक्ति अथवा देशप्रेम भी एक ऐसी भावना है जो २३ साल के युवक भगत सिंह को सपने देखने और घर बसाने की उम्र में देश पर कुर्बान होने के लिए प्रेरित करती है. जो मोहन दास को वकालत छोड़ के महात्मा गाँधी बनने का जूनून देती है। जो झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई को उसके दूध पीते बच्चे को पीठ पर बांध के युद्ध के मैदान में देश के दुश्मनो के दांत खट्टे करने की हिम्मत देती है। मगर आज वो देशभक्ति की भावना, वो देश केलिए कुछ भी कर गुजरने का जूनून जैसे पारी कथा की तरह काल्पनिक या मिथ्या लगता है।
वर्तमान दौर में “वन्दे मातरम” गीत सुनके कितने लोगों पर सरफरोशी का जूनून सवार होता है या फिर "जन गन मन" की ध्वनि हम में से कितनो की रगों में देश के प्रति आदर, सम्मान की भावना का संचार करती है?? चलो एक बार को मान लेते हैं की इन पुराने गीतों या राष्ट्रीय गीत के बोलों का अर्थ समझ पाने में नयी पीढ़ी सक्षम नहीं इसलिए इन गीतों का उन् पर उतना गहरा प्रभाव नहीं पड़ता लेकिन दुःख तब होता है जब देश भक्ति पर बनी नयी फिल्में और गीत भी देश कि भक्ति भावना को झकझोरने में असफल रहते हैं।
आज की हकीकत ये है कि किसी ज़माने में युवाओं के देशभक्ति जज़बे को ललकारने वाला गीत “ये देश है वीर जवानों का” आजकल लोगों को देश भक्ति केलिए कम और भंगड़ा करने केलिए ज़यादा प्रेरित करता है।
फिल्म हकीकत का अमर गीत “कर चले हम फ़िदा” को सुनके शायद ही किसी का देश पर फ़िदा होने को दिल करता हो। मनोज कुमार कि फिल्म भगत सिंह का यादगार गीत “सरफरोशी कि तमन्ना अब हमारे दिल में है अब गणतंत्र दिवस या स्वतन्त्रता दिवस के अवसर पर बार-बार लगातार बजके भी लोगों को देश के प्रति उनके फ़र्ज़ की याद नहीं दिला पाता।
क्या आजके कहानीकारों, गीतकारों की कलम देशभक्ति के जज़बे से नावाकिफ है या वर्तमान निर्देशको कि सोच देशप्रेम कि भावना से अपरिचित है?? या फिर शायद अब हम सभी लोग अपने देश के प्रति उदासीन हो गए हैं।
आज देश १९४७ से पहले की समस्याओं से कहीं अधिक गंभीर और जटिल समस्याओं से जूझ रहा है लेकिन देशप्रेम की जगह कुर्सी प्रेम, देश भक्ति कि जगह माया यानि रुपया भक्ति और देश की एकता की जगह राजनितिक पार्टी एकता के नारों ने ले ली है। टेलिविज़न और रेडिओ आपसी प्रतिस्पर्द्धा के चलते दर्शकों व् श्रोतओ की खोयी नब्ज़ ढून्ढने का दुसाहस नहीं कर पाते।
मिडिया बिकाऊ, नेता बिकाऊ, कुर्सी बिकाऊ पर क्या देश भक्ति की भावना भी बिकाऊ है?? बिकने वाली हर चीज़ तो पैसा लगाके खरीदी जा सकती है न?? लेकिन पैसे में अगर इतनी ताकत होती तो करोड़ों रुपये की लागत से बना गीत “मिले सुर मेरा तुम्हारा” का रीमक फ्लॉप क्यों हो गया??

वो कागज़ की कश्ती वो बारिश का पानी..

आजकल दो प्राइम चेनल्स पर बच्चो का डांस मुकाबला चल रहा है और तीसरा इस चूहा दौड़ में शामिल होने की तैयारी कर रहा है या यूँ कहें कि तीसरे की नक़ल करके पहले दो चैनल्स ने बच्चो को अपनी उँगलियों पर नचा के टीआरपी के खेल का मज़ा उठाने की तैयारी की है।
खैर पहले, दूसरे और तीसरे की गिनती से निकल कर मुद्दे की बात करते हैं। पता नहीं आप में से कितने लोगों ने इस बात को नोटिस किया है कि बच्चो के इन मुकाबलों में कई बच्चे अपनी उम्र से से कहीं ज़यादा मच्योर अदाएं और मेकअप कर के कैमरे के सामने आ रहे हैं। डांस कम्पीटीशन में जीतने केलिए क्या तिकडम लगानी है ये समझ इतने छोटे बच्चो में तो हो नहीं सकती। और जहाँ तक मैं जानती हूँ कोई भी चैनल या प्रोडक्शन हॉउस भी अभिवाकों पर ये दबाव नहीं डालता के वो अपने बच्चो को बच्चा कम और मल्लिका शेरावत ज्यादा बना के आडिशन केलिए लायें। साथ ही सोने पे सुहागा कहावत को चरित्रार्थ करते हुए उन्हें अश्लील अदाओं से जजेस को रिझाने की सीख भी दी जाती है। आखिर क्यों पैसे और पब्लिसिटी के भूखे कुछ लोग अपने बच्चो के मासूम बचपन की अपने अधूरे सपनो पर बलि चढा रहे हैं।
मात्र ६ साल की बच्ची “ज़रा ज़रा टाच मी, जरा ज़रा किस मी” गाने पर कटरीना को भी मात देने वाली अदाएं दिखाए तो उसके लिए किसे दोषी माना जाये?? बात सिर्फ अदाओं तक ही सिमित रहती तो बवाल मचाने की कोई ज़रूरत नहीं थी पर अदाओं के साथ साथ बच्चो के खासतौर पर लड़कियों के कपड़ों पर जिस बेरहमी से कैंची चली होती है उससे देख के मलायका, कटरीना और प्रियंका जैसी अभिनेत्रियाँ भी पानी भारती दिखाई देती हैं। और उस पे तुर्रा ये कि अगर इन बच्चो को रिजेक्ट किया जाये तो अभिवावक हाथ जोड़ने, आंसू बहाने से लेकर प्रोडक्शन वालों के हाथ पैर तोड़ने तक की धमकियों/कोशिशों तक से परहेज़ नहीं करते।
फिर भी अगर नियम, कानून और डांस की तकनिकी बरीकिओं में खामियां निकालकर ऐसे लोगों को रवाना कर भी दिया जाये तो ये लोग आसानी से हार नहीं मानते। या तो ये लोग अपने बच्चे का हाथ थामे एक के बाद दुसरे शो में ऑडिशन फार्म भरते दिखाई देंगे या फिर उसी कार्यक्रम के अगले सीज़न में हिस्सा लेने लिए ताबड़तोड़ तयारी में लग जाते हैं।
क्या इन लोगों के मन में एक बार भी ये नहीं आता कि ये मासूम बचपन एक बार अगर हाथ से फिसल जाये तो फिर कभी, किसी भी सूरत में लौट के नहीं आता। कितनी निर्ममता के ये लोग अपने बच्चों को बचपन कि देहलीज़ लांघने से पहले ही जवानी के गलियारे में ले आते हैं। उनकी टीन एज यानि किशोरावस्था उनसे छीन ली जाती है।
माँ बाप के अधूरे मगर अदृशय सपनो को कब बच्चे अपना सपना समझ बैठते हैं ये उन्हें भी पता नहीं चलता। ऐसे में ये बच्चे भी चाहते हैं कि वे जल्दी से बड़े हो जाएँ और वही सब करें जो वे बड़ों को करता देखते हैं। वैसे भी आजकल बच्चे उम्र और शारीरिक बनावट के लिहाज से भले ही किशोर लगते हों किन्तु मानसिक रूप से वह समय से पहले ही जबरदस्ती जवान बना दिये जाते हैं। ऐसे में जिन बच्चों की ज़िन्दगी में किशोरावस्था के लिए कोई वक़्त, एहसास और ज़रूरत तक बाकि नहीं रहती क्या वो बच्चे सचमुच के बड़े होने पर इस ग़ज़ल के मायने उसी शिद्दत के साथ समझ पाएंगे जिस शिद्दत और रूमानियत के साथ श्री जगजीत सिंह ने इसे गया और हम सब अपने बचपन की याद में अक्सर गुनगुनाने लगते हैं - -
ये दौलत भी ले लो ये शोहरत भी ले लो, भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी
मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन वो कागज़ कि कश्ती वो बारिश का पानी

मुंबई : मायानगरी की माया..


भारत की वाव्सयिक नगरी "मुंबई" जिसके बारे में कहा जाता है की ये शहर कभी सोता नही है॥ और ये बात वाकई सच है॥ इसी शहर को कुछ लोग मायानगरी भी कहते हैं॥ क्योंकि ये वो नगर है जहाँ आसमान के तारे ज़मीन पे नज़र आते हैं॥ हालाँकि शूटिंग वगरह के सिलसिले में ये सितारे ज्यादातर विदोशों में की शिरकत करते हैं मगर उनके स्थाई पतों पर इस मायानगरी की ही छाप होती है॥
खैर हम बात कर रहे थे मायानगरी की माया की॥ सच में साहब यूँ तो अपने काम के सिलसिले में मैं देश के कई छोटे बड़े शहरों में घूम चुकी हूँ मगर इस शहर में मैंने वो सब देखा जो अपनेआप में अजीबोगरीब मिसाल है॥ मुंबई की लाइफ लाइन कही जाने वाली लोकल ट्रेन को ही लीजिये॥ आम दिनों में अगर आप लोकल ट्रेन में सफर करेंगे तो अपनी-अपनी ज़िन्दगी की चक्की में पिसते लोग इतने स्वार्थी हो जायेंगे की ४ लोगों के बैठने की सीट पे आपको ३ लोग बैठे मिलेंगे और लाख मिन्नतें करने पर भी उनमें से कोई तिनका भर भी खिसकने को तैयार नही होगा॥ मानो के ट्रेनकी ये एक सीट ही उनकी आन-बान-और शान की पहचान हो॥ वैसे चाहे यही लोग अपनी सारी ज़िन्दगी एक 8x10 के फ्लैट में ६ और लोगों के साथ गुजार देते हैं॥ और फिर यही लोग आतंकी धमाकों में लहूलुहान हुयी मुंबई के हर अपने-बेगाने के ग़म में इस कदर शरीक हो जाते हैं के जैसे अपनी की उंगली से जुडा नाखून हो॥
खैर इस चर्चा को तो इंसानी फितरत कह के भी दरकिनार किया जा सकता है॥ मगर इस मायावी नगरी की माया के असली पहलु पर गौर फरमाइए॥
मुंबई का पुराना नाम बॉम्बे था ये तो हम सभी जानते हैं मगर बॉम्बे नाम क्यों और किसने रखा ?? क्या सोच के रखा ये कोई नही जनता॥ क्योंकि जब इस शहर का नामकरण बतौर बॉम्बे हुआ उस वक्त ना तो यहाँ बम्ब फटते थे और नही यहाँ कोई "बे" यानि खाडी ही हुआ करती थी थी॥
बात यहाँ ख़तम नही होती यहाँ से तो असली किस्सा शुरू होता है॥ मुंबई में एक बहुत ही मशहूर जगह है चर्च गेट॥ यकीं जानिए की यहाँ दूर-दूर तक न तो कोई चर्च है और न ही कोई ऐसा अनोखा गेट के जिसके नाम से इस जगह का ही नाम चर्च गेट रख दिया जाए॥ बस ये एक लोकल ट्रेनों के ठहरने और प्रस्थान करने का प्रमुख रेलवे स्टेशन है॥
और अब वो जगह जिसे लोग अँधेरी के नाम से बुलाते हैं॥ काफी महंगी जगह है साहब तो ज़ाहिर सी बात है यहाँ रात में भी गाड़ियों और बिल्डिंगों की रोशनी से दिन का ही भ्रम होने लगता है फ़िर इसका नाम अँधेरी क्यों??
इसके बाद ज़िक्र करते हैं बांद्रा नाम की जगह का ॥ शहर की सबसे महेंगी जगहों में से एक इस जगह पर कई नामी-गिरामी फिल्मी हस्तियां भी रहती हैं॥ अपने किंग खान का "मन्नत" भी यहीं है॥ पर साहब बन्दर कोई नही रहता या दीखता यहाँ फ़िर बांद्रा नाम रखने की क्या वजह हो सकती है??
एक और जगह है यहाँ लोअर परेल॥ अब लोअर का हिन्दी में मतलब होता है सामान्य से कुछ निचे मगर हैरत की बात है की ये जगह का धरातल बिल्कुल सामान्य है निचे नही..
यहाँ माँ लक्ष्मी का एक पौराणिक मन्दिर है जिसकी बहुत मान्यता है॥ इस मन्दिर को महालक्ष्मी के नाम से जाना जाता है और मज़ेदार बात ये है की ये मन्दिर है उस जगह नही बना हुआ जिस जगह को लोग महालक्ष्मी के नाम से जानते हैं बल्कि ये मन्दिर हाजी अली में है॥
"लोहार चाल" में कोई लोहार या उनके पुश्ते नही रहे कभी..
लोह्खंडवाला मार्केट वो जगह है जहाँ न तो कभी लोहे का कारोबार हुआ न ही इस वयवसाय से जुड़े लोग ही रहे यहाँ..
भिन्डी बाज़ार में शायद भिन्डी को छोड़ के बाकि सब मिल जाएगा..
जैसे दिल्ली में पराठें वाली गली, किनारी बाज़ार वगैरा में आपको इनके नामों से सम्बंधित चीजों की भरमार मिलेगी मगर यहाँ अंजीर वाडी या मिर्ची गली में कोई भी अंजीर या मिर्ची बेचता हुआ दिखाई नही देगा..
है ना अजीब शहर॥ अपनी ही धुन में सड़कें नापते लोगों की ज़िन्दगी में ९.२०, ७.५० जैसे टाइम बहुत मायने रखते हैं क्योंकि ये टाइम उनकी मंजिल तक पहुँचने वाली ट्रेन के आने का पैगाम लाते हैं..
अपने घर से ज़्यादा लोगों का वक्त ट्रेन, बस, ऑटो रिक्शा के सफर में बीत जाता है..
स्कूल फ्रेंड, कॉलेज फ्रेंड की तरह एक और बिरादरी होती है यहाँ दोस्तों की "ट्रेन फ्रेंड"॥
मुंबई में ही आपको चाइनीज डोसा खाने को मिलेगा, मुंबई में ही आप जैन चिकेन आर्डर करने की जुर्रत कर सकते हैं॥ और मेरा विश्वास कीजिये आज तक किसी धार्मिक संस्था ने इस बात पर बवाल नही मचाया॥ "इसे कहते हैं डेमोक्रेसी सर जी"
फ़िर मिलते हैं ब्रेक के बाद॥

नाम में क्या रखा है??

फ़िल्म और टेलीविजन की दुनिया में कुछ नियम ऐसे हैं जो वर्षौ से निभाए जा रहे हैं और आने वाली कई सदियों तक बिना किसी फेर बदल के निभाए जाते रहेंगे। पत्थर पर खिंची लकीर की तरह इन नियमों में एक अहम् नियम है किसी फ़िल्म या धारावाहिक के किरदारों का सरनेम यानि उपनाम रखना। किसी भी फ़िल्म अथवा धारावाहिक में तीन तरह के किरदार होते हैं। एक वो जो ईमानदार, भावुक, सहनशील और त्याग की प्रतिमूर्ति होते हैं। इस तरह के किरदारों के उपनाम में शर्मा, माथुर, गुप्ता, उपाध्याय, दिक्षित जैसे उपनामों को प्रमुखता दी जाती है। पता नही क्यों कहानीकारों यानि लेखकों को इन् उपनामों में बेचारगी, आंसुओं और आत्मसम्मान का मिक्सचर दिखाई देता है?? हालाँकि असल ज़िन्दगी में इन बिरादरियों में भी अच्छे बुरे सभी तरह के लोग पाए जाते हैं। पर मनोरंजन जगत ने कब, कैसे और क्यों इन जातियों का सम्बन्ध सीधे-साधे, त्यागशील या न्याय के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले लोगों के साथ जोड़ दिया इसका कोई उत्तर मुझे आज तक समझ नहीं आया। चांदनी फ़िल्म में श्री देवी का नाम चाँदनी माथुर, कुछ कुछ होता है में काजोल बतौर अंजलि शर्मा, खाकी का डी सी पी अनंत श्रीवास्तव टेलीविजन धारावाहिक में कितनी मुहोब्बत है की मुख्य किरदार आरोही शर्मा-ये कुछ ऐसे उदाहरण हैं जो इस वक्त मेरे मस्तिष्क के दरवाज़े पर दस्तखत दे रहे हैं।
फ़िल्म और धारावाहिकों की दुनिया में दूसरी किस्म के लोगों में वो किरदार आते हैं जो रईस, रोबदार या फिर खलनायक का चोला पहन के अवतरित होते हैं। इन किरदारों को खरबंदा, वाधवा, चौहान, अग्रवाल, ओबराय, खुराना, खन्ना, वीरानी, चौधरी जैसे वज़नदार उपनामों का धुरी पर घुमाया जाता है। क्योंकि उस किरदार को हमेशा अपने खानदान की इज्ज़त, रुतबे का ऐलान करना होता है ऐसे में वीरानी खानदान, चौधरी परिवार, वधवा फॅमिली आदि शब्दों का प्रयोग कहानी के पात्र की ऊँची आन-बान और शान को अनायास ही स्थापित करने में सहायता करते हैं। फिल्म कुछ कुछ होता है में राहुल खन्ना, चाँदनी का रोहित अग्रवाल, अग्निपथ का विजय दिना नाथ चौहान, बाबुल में बलराज कपूर, और टेलीविजन धारावाहिकों के पूर्वज क्योंकि सास भी कभी बहु थी का वीरानी परिवार, कुमकुम का वाधवा खानदान, कहानी घर घर की का अग्रवाल परिवार और नई फसल में बंदनी का माहियावंशी परिवार आदि वो उदाहरण हैं जो छोटे-बड़े परदे की कहानी के तयशुदा नियमों पर खरे उतरते हैं।
आख़िर में बात करते हैं छोटे-बड़े परदे के मसखरों यानि हंसने-हँसाने वाले किरदारों की। तो इनके लिए ज्यादातर उपनामों के झमेले में पड़ने की बजाये इनके सिर्फ़ नाम पर ही ध्यान दिया फिर भी। फूल एंड फाइनल का किट्टू पाइलेट, हम आपके हैं कौन में लल्लू, आवारा पागल दीवाना का छोटा छतरी। फिर भी अगर कभी इन्हे उपनामों से नवाजना पड़े तो ज्यादातर दारूवाला, पोपट, चिटनिस, गंसोल्वेस, खोटे, गोडबोले, पिल्लै, सिद्धू, सिंह, यादव, पांडुरंग, आदि उपनामों की लक्ष्मण रेखा के भीतर ही हर लेखक के दिमाग का घोड़ा चक्कर काटता दिखाई देता है।
इस बे-सर पैर के नियम का पालन क्यों किया जाता है पता नहीं। मगर हैरानी की बात ये है की कहानी, किरदार और घटनाओं में नवीनता खोजने वाले लेखकों का खोजी दिमाग कभी भी इस नियम के विरूद्ध जाने का खतरा मोल नहीं लेता।
बहरहाल असल ज़िन्दगी में कोई भी धर्म, जाति या बिरादरी ऐसे किसी नियम से बंधी हुई नही है क्योंकि अगर ऐसा कोई नियम होता तो ऋषि पुलस्त्य के यहाँ राक्षस बुद्धि रावन का जन्म नहीं होता है और राक्षस राज हिरणाकश्यप के यहाँ श्री हरि के परम भकत प्रह्लाद अवतरित न हुए होते।

शुक्रवार, 11 अक्टूबर 2013

फ़िल्म इंडस्ट्री, प्रोफ़ेशनलिज़्म और आशुतोष गोवारिकर..

फ़िल्म इंडस्ट्री में ख़ुद को "प्रोफ़ेशनलिज़्म" के इकलौते जन्मदाता माननेवाले लोगों की कमी नही है॥ इन लोगो को अपने किसी खास रवैये की वजह से यह ग़लतफ़हमी होती है या यूँही "ज़रा हटके" जुमले का इस्तेमाल करने को लालायित ये लोग अपनेआप ही अपने माथे पर "प्रोफ़ेशनलिज़्म" की पट्टी बाँध लेते हैं, ये बात आजतक मुझे समझ नही आई॥
बातों के व्यूह जाल में न फंसते हुए असली घटना की चर्चा करते हैं॥ बात तबकी है जब मैं बीबीसी केलिए एक कार्यक्रम बना रही थी॥ कार्यक्रम का नाम था "बॉलीवुड इंक", यह प्रोग्राम हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्री के इतिहास, वर्तमान और उसके व्यावसायिक पहलुओं पर रोशनी डालता था। इंडस्ट्री के अलग-अलग डिपार्ट्मेंट्स जैसे फ़िल्म निर्माण, निर्देशन, फ़ाइनान्स, सैट डिसाइनिंग, कास्टयुम डिसाइनिंग आदि में आए बदलाव पर भी हम इस कार्यक्रम में बात करते थे॥ फ़िल्म इंडस्ट्री से जुडा कोई कार्यक्रम हो तो ज़ाहिर सी बात है की फ़िल्म निर्माता, निर्देशक और कलाकारों से मुलाकात और उनके दृष्टिकोण से दर्शकों को रु-ब-रु करवाना कार्यक्रम का एक अहम् हिस्सा होता है॥
आगे बढ़ने से पहले एक बात ख़ास तौर पर में कहना चाहूंगी कि "बॉलीवुड" इस नाम का इस्तेमाल करने से इंडस्ट्री में कई लोगों को परहेज़ है॥ और मैं ख़ुद उसी वर्ग विशेष का ही हिस्सा हूँ॥ जिन्हें लगता है कि हर चीज़ मे अंग्रेजों की नक़ल या उनकी सोच कि गुलामी अच्छी नही॥ "हॉलीवुड की तर्ज़ पर" अपनी इंडस्ट्री का नाम "बॉलीवुड" रखना हम लोगों को शर्मनाक लगता है॥ इस मामले में अमिताभ बच्चन सबसे आगे हैं, बच्चन साहब कभी भी "बॉलीवुड" शब्द का इस्तेमाल नही करते और ना ही ऐसी किसी किताब, कार्यक्रम या प्रोजेक्ट में इंटरव्यू देते हैं जहाँ हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्री को बॉलीवुड कह कर संबोधित किया जाए॥
खैर वो बच्चन साहब हैं कुछ भी करने या न करने का निर्णय ले सकते हैं॥ मगर हम लोग कई दफा न चाहते हुए भी हालत या "प्रोफ़ेशनलिज़्म" की चक्की में पिस जाते हैं॥ जिसका सबसे जीवंत उदाहरण है की मैं ख़ुद "बॉलीवुड" नाम के इस्तेमाल से परहेज़ करती हूँ मगर मैं इस कार्यक्रम का एक अहम् हिस्सा थी॥
इस कार्यक्रम के दौरान कई नामी-गिरामी फिल्मी हस्तियों से मिलने और उनके विचार जानने का मौका मुझे मिला॥ फ़िल्म निर्माण के विभिन्न पहलुओं के बारे में कई बारीकियाँ भी जानने और समझने को मिली॥
मगर इस सब के दौरान एक ऐसी घटना घटित हुयी जिसने इस चमकते आसमान के पीछे के अंधेरे से एक बार फ़िर मेरा परिचय करवाया॥ फ़िल्म निर्देशन के क्षेत्र में आए बदलाव के बारे में किसी सफल और मशहूर निर्देशक का इंटरव्यू मुझे करना था॥ गोवारिकर साहब को मैंने फ़ोन पर अपने कार्यक्रम के बारे में बताया और उनसे इंटरव्यू का टाइम निर्धारित किया॥
समय पर हम लोग आशुतोष के दफ्तर पहुँच गए और कैमरा टीम ने अपना काम शुरू कर दिया॥ समय का सदुपयोग करने के लिहाज़ से मैं और मेरे कार्यक्रम की निर्देशिका हम दोनों आशुतोष को अपने कार्यक्रम के बारे में विस्तार से बताने में व्यस्त हो गए॥
सब कुछ ठीक ठाक था॥ और कैमरा सैट होते ही आशुतोष ने माइक लगाया और अपनी जगह पर विराजमान हुए॥ कि अचानक उन्हें ख्याल आया की इस कार्यक्रम का नाम तो "बॉलीवुड इंक" है॥ और वो कैसे किसी ऐसे कार्यक्रम का हिस्सा बन सकते हैं जिसमें हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्री को "बॉलीवुड" कह कर संबोधित किया जा रहा हो??
बस फ़िर क्या था आशुतोष ने हमसे कुछ पल की इजाज़त मांगी और उसके बाद हमें अपने निर्णय से अवगत करवाया की वो इस कार्यक्रम में हिस्सा नही लेंगे॥ या तो कार्यक्रम का नाम बदला जाए और या उन्हें इसमें बोलने के लिए मजबूर न किया जाए॥ ऐसे में आधा दर्जन लोगों की टीम कैमरा, लाइट और बाकी साजो-सम्मान के साथ वहां आशुतोष के दफ्तर में खड़ी ख़ुद को आला दर्जे का बेवकूफ महसूस कर रही थी॥ इस परिस्थिति का सामना करना मेरे लिए सबसे ज़्यादा कठिन था क्योंकि मैंने ही आशुतोष से बात करके उन्हें अपने कार्यक्रम और उसके विषय के बारे में अवगत करवाया था॥ काफी कोशिश की गई आशुतोष को यह समझाने की कि इस यूँ आखिरी मौके पे उनका इनकार हमारे लिये कई मुसीबतें खड़ी कर देगा॥ मगर फ़िल्म इंडस्ट्री में "प्रोफ़ेशनलिज़्म" का ढोल पीटने वालों में अग्रणीय आसुतोष अपने इरादों से टस से मस नही हुए॥ मगर जैसा कि हमारी इंडस्ट्री में एक प्रसिद्द कहावत है कि "द शो मस्ट गो ऑन".. और वो शो भी बना बस फर्क सिर्फ़ इतना था कि कुछ बड़ी मुश्किलों का सामना करने के बाद उस कार्यक्रम में आशुतोष कि जगह परिणीता फ़िल्म के निर्देशक प्रदीप सरकार ने फ़िल्म निर्माण के विभिन्न पहलुओं पर रोशनी डाली। और दर्शकों को मनोरंजक तरीके से कुछ ज्ञानवर्धक बातें बताने की हमारी कोशिश पुरी तरह कामयाब रही॥

कवियों की "लक्ष्मी आराधना"..

टेलीविजन केलिए काम करते हुए कई बार अजीबोगरीब किस्से देखने को मिलते हैं। जो हैरान भी करते हैं और कभी कभी परेशान भी। ऐसा ही हैरान-परेशान करने वाला एक वाक्या मुझे देखने को मिला जब मैं एक रियैलिटी शो के लिए काम कर रही थी। इस शो पर खेलने वाले के सामने जीत का लक्ष्य था पूरे १ करोड़ रुपये जिसे पाने केलिए दिमाग की नही किस्मत और तुक्के की ज़रूरत पड़ती थी। यानि कोई सवाल जवाब नही बस कुछ डिब्बे ये ध्यान में रखते हुए खोलो की १ करोड़ वाला डिब्बा किसी हाल में भी न खुलने पाए।
इस शो के आडिशन में हम लोग आम जनता को ही खेल के लिए आमंत्रित करते थे मगर सप्ताह के १ दिन एक स्पेशल एपिसोड में एक खास वर्ग या समुदाय को खेलने के लिए बुलाया जाता था। जैसे ऑटो रिक्शा चालक, काम वाली बाई, सिख समुदाय के लोग आदि। हर एपिसोड में हमें २० से ऊपर लोगों की ज़रूरत पड़ती थी जिनमें से सिर्फ़ एक को खेलने का मौका मिलता था । ज़ाहिर सी बात है की इतने लोग एक परिवार के हो नही सकते और ये हमारे नियमों के खिलाफ भी था। तो ऐसे में उस पुरे समुदाय या ग्रुप में से जिस एक खुशकिस्मत को खेलने का मौका मिल जाता था उसको छोड़ बाकि सबके चेहरे बुझ जाते थे। ऐसे में दमदार एपिसोड की उम्मीद करना पानी के दिए जलाने से भी मुश्किल काम था।
खैर रियलिटी शो है तो हम लोग ज़्यादा कुछ कर भी नही सकते । मगर मुझे याद है की बैसाखी स्पेशल एपिसोड में जब हमने सिख समुदाय के लोगों को मुंबई के विभिन्न इलाकों से चुना तो खेल से पहले उन्होंने एक निर्णय लिया की जो भी हो खेल की भावना को जीवित रखेंगे और चुनिन्दा खिलाड़ी चाहे एक रूपया जीते यां एक करोड़ उसे वो सब आपस में बाँट लेंगे। उनके इस निर्णय का नतीजा चमत्कारिक निकला और वो बैसाखी स्पेशल एपिसोड सचमुच "पंजाबियों" के व्यक्तित्व के अनुसार ही जोश, एकता और भाई चारे की भावना से भरपूर था। उस खेल का अंत भी बहुत रोमांचक था क्योंकि उन लोगों के जोश और एकता से हम सभी टीम मेंबर बहुत प्रभावित थे ऐसे में हम सभी दिल से दुआ कर रहे थे की वो लोग ज़्यादा से ज़्यादा रकम जीतें और आपस में बांटे। मगर किस्मत का खेल था और हम लोग सिर्फ़ कार्यकर्म का संचालन कर सकते थे किस्मत का नही। इसलिए उस खेल के अंत में दो डिब्बे बचे एक वो जिसमें मात्र हज़ार रुपये थे और दुसरे में पच्चीस लाख। पर सिखों की एकता को किस्मत ने भी सलाम किया और वो लोग पुरे २५ लाख जीत का जश्न मानते हुए घर गए।
उसके बाद उनके इस निर्णय ने कई और समुदाय और वर्ग के लोगों को ऐसा ही करने केलिए प्रेरित किया और हमें कई बेहतरीन एपिसोड मिले।
खैर अब असली मुद्दे की बात पर आते हैं । अबकी बार होली स्पेशल एपिसोड में हम लोगों ने हास्य कवियों को आमंत्रित करने का फैसला किया। होली का मौका है हर एक कवि अपना डिब्बा खोलने से पहले हास्य व्यंग की अपनी एक कविता पढेगा और किस्मत का खेल कुछ खट्टा और कुछ मीठा हो जाएगा।
शूटिंग के रोज़ मुंबई, दिल्ली के कई नामी-गिरामी कवियों के हास्य व्यंग से हमारा स्टूडियो चहक रहा था। सभी को खेल के नियम बताये गए और पहले के कुछ एक एपिसोड भी दिखाए गए । मगर जनाब १ करोड़ का खेल था तो ज़ाहिर सी बात है की उस दिन सभी कवि महाशय घर से निकलते वक्त माँ सरस्वती की नही बल्कि माँ लक्ष्मी को ढोक देके और मन्नत मांग कर घर से निकले होंगे। खेल के नियम सब ने समझे मगर सवाल वही की खेलने का मौका सिर्फ़ एक को मिलेगा?? तो बाकि लोग क्या सिर्फ़ डिब्बे खोलने के लिए इस कार्यक्रम में अपनी मुहं दिखाई करेंगे?? तभी किसी ने उस बैसाखी स्पेशल एपिसोड का ज़िक्र किया की क्यों न उन्ही की तरह यहाँ भी जीत की रकम को बराबर बाँट लिया जाए?? मगर इस बात ने जैसे वातावरण में घुले हास्य-व्यंग के अबीर-गुलाल में मानों मिटटी और कंकर मिलाने जैसा काम किया। आदरणीय कविओं की उस बरात में सबसे बुजुर्ग कवि महाशय ने अपने माथे पर एक करोड़ से भी ज़यादा त्योरियां चढाते हुए कहा की मैं चाहे एक रुपया जीतूँ या एक करोड़ पर अपनी जीत की रकम में किसी को एक कौडी भी नहीं दूंगा। बस फिर क्या था एक करोड़ की दुल्हन को हर बाराती अपने साथ ले जाने के सपने देखने लगा और हास्य व्यंग के उस माहौल में घुली मिश्री की जगह जलन और स्वार्थ की मिर्ची ने ले ली।
फिर जो हुआ उसका अनुमान आप सभी लगा सकते हैं बाराती चाहे २० से ज़्यादा थे मगर दूल्हा तो एक ही बन सकता था। ज़िन्दगी में पहली बार मैंने माँ लक्ष्मी का ये चमत्कार देखा जिन्होंने कवियों को भी बनियागिरी सिखा दी।

जब बड़े ईमाम साहब ने की छोटी बात..

बात तब की है जब मैं आतंकवाद पर आधारित एक कार्यक्रम बना रही थी। दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले इस कार्यकर्म में मुझे आतंकवाद से सम्बंधित हर घटना में वो सबूत दर्शकों के सामने रखने होते थे जो ये साबित कर सकें की पड़ोसी मुल्क ही भारत में आंतकवाद को समर्थन और सहायता दे रहा है। काम मुश्किल था इसलिए हर एपिसोड के लिए खासी मशकत करनी पड़ती थी। हर आतंकवादी वारदात में मुजरिम पड़ोसी देश में बैठे अपने हुक्मरानों के साथ अपने ताल्लुकात होने के सबूत पीछे छोड़ के जाए ये ज़रूरी नही। इसलिए कई बार तथ्यों को साबित करने केलिए हमें सुरक्षा विशेषज्ञयों से भी बात की करनी पड़ती थी।
"जेहाद" के नाम पर बेकसूरों का खून बहाने वाले आतंकवादियों ने इस बार श्री नगर की एक मस्जिद को अपना निशाना बनाया था । जहाँ नमाज़ के वक्त बम्ब ब्लास्ट करके इन आतंकवादियों ने एक बार फ़िर ये साबित कर दिया था की उनका मुस्लिम अवाम, मज़हब और देश से कोई वास्ता नही है। "जेहाद" के नाम पर मज़हब को बदनाम करने वालों की पोल खोलने की एक और कोशिश मैं करना चाहती थी। इसलिए इसबार किसी सुरक्षा विशेषज्ञ की जगह एक मुस्लिम धर्म गुरु को अपने कार्यकर्म में शामिल करने का मैंने फ़ैसला किया। अपने इस फैसले को अंजाम देने केलिए मैंने दिल्ली की एक प्रमुख मस्जिद के बड़े ईमाम साहब से संपर्क किया ताकि उन्ही की ज़ुबानी अवाम तक "जेहाद" का असली मतलब पहुँच सके। और ख़ुद को मुसलमानों का खैरख्वाह कहनेवाले आतंकी दरिंदों के स्वार्थ का परदा फाश हो।
बड़े ईमाम साहब ने बखुशी मुझे और मेरी कैमरा टीम अपने घर आमंत्रित किया॥ दिल्ली के एक पुराने इलाके की तंग गलियों से होते हुए मैं और मेरी टीम तयशुदा वक्त पर बड़े ईमाम साहब के घर पहुँची। आदतन पहले मैंने उन्हें अपने कार्यकर्म और वर्तमान एपिसोड के बारे में विस्तार से बताया। उनसे बात करने के पीछे मेरा मकसद क्या है ये भी उन्हें बता दिया। इस साक्षात्कार में मेरा सबसे अहम सवाल था की क्या श्री नगर की मस्जिद पर हुए आतंकवादी हमले को "जेहाद" कहा जाएगा ??
मेरी कैमरा टीम अभी अपना कैमरा सैट कर रही थी इसलिए ईमाम साहब ने बेखौफ होके कहा कि "नही ये "जेहाद" नही है। जेहाद का मतलब होता है मज़हब की सुरक्षा, आत्म-सुरक्षा या किसी बेबस की सुरक्षा के लिए हथियार उठाना (मैं ये लेख "जेहाद" के मायने पर ववाद-विवाद करने कि मंशा से नहीं लिख रही हूँ, ये इमाम साहेब के लफ्ज़ हैं जिनको मैंने बिना किसी हेर-फेर के यहाँ लिखा है) अपनी बात जारी रखते हुए बड़े ईमाम साहब ने आगे कहा कि ख़ुदा की बंदगी करते मुसलमानों पर हमले को किसी भी सूरत में "जेहाद" का नाम नहीं दिया जा सकता। चंद मतलब परस्त लोग अपने स्वार्थ के लिए मज़हब के नाम पर ये फसाद पैदा कर रहे हैं। और मैं इसकी खिलाफत करता हूँ। (यहाँ एक बार फिर मैं याद दिलाना चाहूंगी कि ये सब बातें वो अभी कैमरा के सामने नहीं बोल रहे थे)"
उनके इस बयान से मैं संतुष्ट थी इसलिए मैंने कैमरा आन कर बड़े ईमाम साहब के सामने फिर से अपना वही सवाल दोहराया। मगर ये क्या इस बार ईमाम साहब ने मस्जिद पर हुए हमले की सिर्फ़ निंदा कि और बिना दम लिए उन्होंने अपनी बात को आगे बढाया कि "हमें ये भी देखना होगा के मस्जिद पर हमला करने वालों का मकसद क्या है, वो क्या चाहते हैं, इतने सालों से उनकी फरियाद कोई नहीं सुन रहा कहीं इसलिए तो उन्हें ये कदम नहीं उठाने पड़ रहे। कहीं हम लोग उनके साथ नाइंसाफी तो नहीं कर रहे?"
उनकी इस टिपण्णी को सुनके मैं और मेरा कैमरामन एक दुसरे कि तरफ़ हैरत से देखने लगे क्योंकि अभी चंद लम्हे पहले जब कैमरा आन नहीं था तब हमलोगों ने आतंकवाद के खिलाफ ईमाम साहब के सुरों का आरोह ख़ुद सुना था और अब कैमरा आन होते ही वही सुर अवरोह कि गति पकड़ रहे थे।

मैं परेशान थी कि आखिर ईमाम साहब किसका समर्थन कर रहे हैं?? आए दिन हो रहे हमलों में मारे जा रहे बेकसूर लोगों को बचाने का या जेहाद के नाम पर उन बेकसूरों के खून से होली खेलने वाले आतंकवादियों का? वो तो किसी को भी ग़लत नहीं कह रहे। खैर ईमाम साहब की बात ख़तम होते ही मैंने कैमरा बंद करवा कर उन्हें याद दिलाया की कैमरा आन होने से पहले उन्होंने आतंकवाद की खिलाफत के लिए कुछ और ब्यान दिया था। इस पर ईमाम साहब फिर से अपनी पुराणी टिपण्णी पर वापिस आ गए और मुझे लगा की शायद उन्हें मेरा सवाल समझने में गलती हूई होगी इसलिए कैमरा आन करके मैंने एक बार फिर उन्हें अपनी बात जनता के सामने कहने का मौका दिया। मगर इस बार फिर उनका जवाब राजनितिक गलियारों की प्रदूषित हवा का शिकार हो रहा था। और ईमाम साहब "ये भी ठीक और वो भी ठीक" के तीरों से मेरे सवालों के तरकश को ही भेदने की कोशिश कर रहे थे। इस तरह करीब आधा दर्जन से ज़्यादा बार ईमाम साहब ने शब्दों का हेरफेर करके ये साबित कर दिया की उनके दो सुर हैं एक की तान वो कैमरे के पीछे छेड़ते थे और दुसरे की कैमरे के आगे। मतलब साफ था की राजनीति या सियासत के मामले में सिर्फ़ संसद के गलियारों में शिरकत करने वालों को ही महारथ हासिल नहीं होती।
बहरहाल बड़े ईमाम साहब की कोइ भी टिका-टिपण्णी मेरे काम की नही थी। क्योंकि मुझे किसी राजनीतिज्ञ की नही ब्लकि एक धर्म गुरु के बयान की ज़रूरत थी जो "जेहाद" के नाम पर गुमराह होते नौजवान क़दमों को "जेहाद" का असली मायने बतायें, जो कौम पर लग रहे दाग़ को धोने में पहल कर एक मिसाल कायम करें।
मैंने और मेरी टीम ने आदर के साथ बड़े ईमाम साहब का शुक्रिया अदा किया और उनसे इजाज़त मांगी। जाते-जाते उन्होंने मुझसे पूछा "मोहतरमा मुझे उम्मीद है कि आप मेरे जवाब से संतुष्ट होंगी और देश के नौजवानों को सही दिशा दिखाने की आपकी मुहीम में मेरा भी योगदान रहेगा।"
मैंने बस हाँ में सर हिलाया जबकि मेरी कैमरा टीम जानती थी की इस वक्त मैं ईमाम साहब के शुक्रिया और मशवरे के बारे में नही बल्कि अपने अगले कदम के बारे में सोच रही हूँ। क्योंकि लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ यानि पत्रकारिता में किसी भी कीमत पर सच्चाई को अवाम के सामने पेश करने का जूनून हमें परेशानियों का सामना करने की ताकत देता है।
मैंने उसी वक्त दिल्ली की एक और बड़ी मस्जिद के ईमाम साहब से बात की और उनसे बिना वक्त जाया किए उसी समय मिलने कि इजाज़त मांगी। उनसे मिल कर मैंने उन्हें श्री नगर की मस्जिद में हुए हमले के बारे में उनकी आवाज़ अवाम तक पहुँचाने कि गुजारिश की ताकि "जेहाद" के नाम पर पथभ्रष्ट होते युवायों का मार्गदर्शन हो सके। मेरी बात सुन कर ईमाम साहब मुस्कराए, कुछ पल की चुप्पी के बाद उन्होंने कहा कि आप जो सच मुझसे सुनना चाहती हैं वो अगर मेरी जुबान से निकला तो मेरे साथ-साथ मेरे खानदान के लहू के कतरों तक को भी सुखा दिया दिया जाएगा। मगर मज़हब पर लग रहे इस दाग को अगर मेरे लहू के कतरे धो सकते हैं तो मैं इसे अल्लाह कि असली इबादत समझूंगा। उनके इस जज्बे को हम लोगों ने मन ही मन सलाम किया और ईमाम साहब ने कैमरा आन होते ही अपने शब्दों का मान रखा और आप सभी को ये जान के खुशी होगी की उनकी किसी भी टिपण्णी में राजनीती की दुर्गन्ध नहीं आ रही थी।

उनके साथ हुई बात-चित के बाद मेरे दिमाग में मोहम्मद इकबाल की रची ये पंक्तियाँ गूंज रही थी
"मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना हिन्दी हैं हम वतन हैं हिंदुस्तान हमारा"..