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गुरुवार, 18 अगस्त 2016

ओल्ड-बोल्ड and ब्यूटीफुल...


हिंदी फिल्मों में सबसे बोल्ड एंड ब्यूटीफुल हिरोइन्स की अगर लिस्ट बनायीं जाये तो उस लिस्ट में आप सबसे पहले किसका नाम लिखेंगे? सन्नी लिओनी को अगर एक तरफ रख कर सोचें तो "डर्टी पिक्चर" की खुबसूरत विद्या बालन का या फिर बोंगशैल बिपाशा बासु का या हो सकता है कि आप इस लिस्ट की शुरुआत हरियाणवी बाला मल्लिका शेरावत के नाम से करें. लेकिन फिल्मों के इतिहासकरों को अगर ये लिस्ट बनानी पड़े तो वो इस लिस्ट की शुरुआत हिंदी फिल्मों की सबसे पहली बोल्ड, बेबाक, बिंदास हीरोइन देविका रानी के नामसे करेंगे. नोबल पुरस्कार से सम्मानित कविश्री रविन्द्रनाथ टैगोर की भतीजी देविका अपने युग से कहीं आगे की सोच रखने वाली एक्टर थीं. हिंदी फिल्मों की पहली स्वप्न सुंदरी और ड्रैगन लेडी कहलाने वाली देविका ने 1933 में बनी फिल्म “कर्मा” में “कीसिंग” सीन देकर जैसे ज़माने की नीव हिला के रख दी थी, ये वो दौर था जिस जब भारत की महिलायें घर की चारदीवारी के भीतर भी घूंघट में मुँह छुपाये रहती थीं.पद्मश्री और दादा साहेब फाल्के अवार्डधारी देविका और उनके पति हिमांशु राय के बीच फिल्माए गए इस चार मिनट लंबे किसिंग सीन को आज भी इन्डियन फिल्म हिस्ट्री में सबसे लंबे कीसिंग सीन का दर्जा हासिल है।


देविका की देखा-देखी “ट्रेजेडी-क्वीन” मीनाकुमारी ने भी फिल्म “फुटपाथ” में उस ज़माने के हिसाब से काफी बोल्ड सीन दिए, उसके बाद फिल्म “आवारा” में नर्गिस, "दिल्ली का ठग" में नूतन, फिल्म "अपराध" में मुमताज़ और "एन इवेनिंग इन पेरिस" में शर्मीला टैगोर ने टू-पीस बिकनी की मशाल जला के ना जाने कितने महिला मुक्ति मोर्चे वालों की नींद हराम कर दी थी. ये उस दौर की नारियों का दुस्साहस था जब फिल्मों में हीरोइन का काम किसी डेली सोप्स की फीमेल प्रोटेगोनिसट की तरह ६ गज़ लंबी साड़ी के पल्लू से आंसू पोंछने से ज़्यादा कुछ नहीं होता था.
लेकिन आज रील और रियल लाइफ दोनों जगह हालत बदल चुके हैं. आज जबकि रियल लाइफ में भी लड़कियों का “फिज़िकल एक्स्पोज़र” स्टेटस सिम्बल या मोर्डनिज्म का सीनोंनीम बन चुका है तो ऐसे में फ़िल्मी अप्सराओं का कम कपड़ों में दिखाई देने पर ना तो किसी महिला मुक्ति मोर्चे के पेट में दर्द होता है और ना ही फिल्म क्रिटिक ही अब इस बात पर कोई खास तवज्जो देते हैं. लेकिन इन बदले हालत में नई पौध की हीरोइनो के सामने सबसे बड़ी चुनौती है रातों रात लोकप्रिय बनाने का कोई खासा-म्-खास फोर्मुला ढूंडना. क्योंकि अगर लोकप्रियता हासिल करने के सपने को महज़ एक्टिंग और टेलेंट के भरोसे छोड़ा गाया तो एक ना एक दिन खुद को यही समझाना पड़ेगा कि “बालिके – ना नौ मन तेल होगा और ना राधा नाचेगी”.

शनिवार, 25 जुलाई 2009

सत्तर के उस पार क्या है??

कुछ लोग होते हैं जो दूसरों की मिसाल या उदाहरण दे कर ज़िन्दगी जीते हैं और कुछ लोग वो होते हैं जो जीते जी औरों के लिए एक मिसाल बन जाते हैं। ज़िन्दगी के हर मोड़ पार कुछ न कुछ नया, प्रगतिशील और जीवंत उदाहरण बनने का मनो इन लोगों में एक जूनून सा होता है। इन् लोगों पर उम्र कभी हावी नहीं होती बल्कि ये लोग हर हाल में अपनी उम्र पर हावी हो के ये सोचने पर मजबूर कर देते हैं की क्या सचमुच ये लोग ७० का आंकडा पार कर चुके हैं??
बात की शुरुआत करते हैं पहली बार ऑस्कर पुरस्कार समिति को एक हिन्दी गीत गुनगुनाने और समझने पार मजबूर करने वाले सम्पूरण सिंह कालरा यानी हम सब के अपने "गुलज़ार साहब" से। करीब तीन साल पहले उम्र की ७०वीं देहलीज़ पार कर चुके गुलज़ार साहब जैसे अब आदी हो चुके हैं अपने गीतों से हर साल एक नया इतिहास रचने की। कहानी, संवाद लेखन से लेकर गीत रचना, फ़िल्म निर्माण-निर्देशन, मानों हर जगह गुलज़ार साहब अपना नाम देखने आदत पड़ गई है। पुरस्कारों के मामले में भी इनकी अभिलाशों के बाल अभी भी पके नहीं हैं। गौरतलब है की अपनी कलम को अपनी पहचान बनाने से पहले गुलज़ार साहब एक कार गैरेज में काम करते थे। इनकी कभी न ख़तम होने वाली पारी और कितनी बार दुनिया को इनकी जय बुलाने पर मजबूर करेगी ये कहना मुश्किल है।
आगे बात करते हैं मंगेशकर बहनों की। सत्तर बसंत इन्होने बस यूँ हीं गाते-गुनगुनाते, हम सब का दिल बहलाते कब और कैसे बिता दिए ये किसी को भी पता नहीं चला। विविध भाषाओं वाले देश भारत की किस-किस भाषा के गीतों को इन्होने अपनी जादुई आवाज़ से सजाया है ये कहने से बेहतर होगा ये तलाशा जाए कि कौन सी भाषा में इन् दोनों बहनों संगीत कि साधना नहीं की ? फिल्मफेर, राष्ट्रिय पुरस्कार, दादा साहब फाल्के पुरस्कार इनके लिए मानों हर साल उगने वाली फसलों की तरह हैं। पुरस्कारों कि भीड़ का सामना करते-करते ये बहने भले ही थक चुकी हों लेकिन इनके चाहनेवाले इनकी आवाज़ के जादू से अभी थके नहीं हैं।
ज़िन्दगी में ७० दशकों के बाद एक नई जवानी की बुनियाद रखने वालों में फ़िल्म जगत ही अग्रणीय है ऐसा नहीं है। चौदवी और पन्द्रहवीं लोक सभा में कांग्रेस के सर पर जीत का सेहरा बांधने वाले और पूरे देश को "सिंग इस किंग" का नारा देने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की उपलब्धियों की सूची इनकी उम्र में दर्ज सालों से भी बड़ी हो चुकी है। और वहीँ ७० जमा १० अस्सी के आंकडे को भी छू चुके श्री लाल कृष्ण आडवानी ने तो अपनी जोश और नेतृत्व से अपने से आधी उम्र के राहुल गाँधी तक को अपनी लोकप्रियता और सूझ-बुझ के प्रति आशंकित कर दिया था। देव आनंद, मकबूल फ़िदा हुसैन, जोहरा सहगल, भीम सेन जोशी, दारा सिंह, यश चोपडा ये वो नाम हैं जो आज की युवा पीढी को ये सोचने पर मजबूर करते देते हैं कि क्या इनसे दुगने जोश और सकारात्मक परिस्थितियों के बावजूद वो लोग इनके हौसलों को कहीं रत्ती भर भी छू सके हैं। आखिर इन हरफनमौला, ७०+नौजवानों की ढलती उम्र में चढ़ते जादू का राज़ जानने की क्या कभी हमारे युवा कोशिश करेंगे??