#UriAttack के शहीदों की चिता की राख ठण्डी न हुई थी कि हमें hypocrite पाकिस्तानी कलाकार अच्छे लगने लगे, कोई बड़ी बात नहीं कि उन शहीदों की अन्तिम क्रिया पूरी होने तक हमें नवाज़ शरीफ़ भी एक मजबूर, बेबस प्रधानमंत्री लगने लगे, फिर उन 18 शहीदों की बरसी होते-होते हम फिर से आतंकवादी हाफिज़ सईद के नाम के साथ "जी" लगाना शुरू कर दें, और साथ ही हमारी बरखाओं और अरुन्धतियों के नाम फिर से खुल्लम-खुल्ला पाकिस्तानी आतंकवादियों के दुआ-सलाम और न्योते आने शुरू हो जाये...
Life is a Journey.From Kashmir to Kanyakumari,beginning till the end of another story, it is one long curve, full of Turning Points.. You never know which place, person, time, season or circumstance will affect LIFE, HEART, MIND or SOUL.. This blog is all about those Turning Points..
शनिवार, 24 सितंबर 2016
Uri Attack, भारत की pseudo secular रुदालियाँ और पाकिस्तानी कलाकार
#UriAttack के शहीदों की चिता की राख ठण्डी न हुई थी कि हमें hypocrite पाकिस्तानी कलाकार अच्छे लगने लगे, कोई बड़ी बात नहीं कि उन शहीदों की अन्तिम क्रिया पूरी होने तक हमें नवाज़ शरीफ़ भी एक मजबूर, बेबस प्रधानमंत्री लगने लगे, फिर उन 18 शहीदों की बरसी होते-होते हम फिर से आतंकवादी हाफिज़ सईद के नाम के साथ "जी" लगाना शुरू कर दें, और साथ ही हमारी बरखाओं और अरुन्धतियों के नाम फिर से खुल्लम-खुल्ला पाकिस्तानी आतंकवादियों के दुआ-सलाम और न्योते आने शुरू हो जाये...
गुरुवार, 18 अगस्त 2016
ओल्ड-बोल्ड and ब्यूटीफुल...
हिंदी फिल्मों में सबसे बोल्ड एंड ब्यूटीफुल हिरोइन्स की अगर लिस्ट बनायीं जाये तो उस लिस्ट में आप सबसे पहले किसका नाम लिखेंगे? सन्नी लिओनी को अगर एक तरफ रख कर सोचें तो "डर्टी पिक्चर" की खुबसूरत विद्या बालन का या फिर बोंगशैल बिपाशा बासु का या हो सकता है कि आप इस लिस्ट की शुरुआत हरियाणवी बाला मल्लिका शेरावत के नाम से करें. लेकिन फिल्मों के इतिहासकरों को अगर ये लिस्ट बनानी पड़े तो वो इस लिस्ट की शुरुआत हिंदी फिल्मों की सबसे पहली बोल्ड, बेबाक, बिंदास हीरोइन देविका रानी के नामसे करेंगे. नोबल पुरस्कार से सम्मानित कविश्री रविन्द्रनाथ टैगोर की भतीजी देविका अपने युग से कहीं आगे की सोच रखने वाली एक्टर थीं. हिंदी फिल्मों की पहली स्वप्न सुंदरी और ड्रैगन लेडी कहलाने वाली देविका ने 1933 में बनी फिल्म “कर्मा” में “कीसिंग” सीन देकर जैसे ज़माने की नीव हिला के रख दी थी, ये वो दौर था जिस जब भारत की महिलायें घर की चारदीवारी के भीतर भी घूंघट में मुँह छुपाये रहती थीं.पद्मश्री और दादा साहेब फाल्के अवार्डधारी देविका और उनके पति हिमांशु राय के बीच फिल्माए गए इस चार मिनट लंबे किसिंग सीन को आज भी इन्डियन फिल्म हिस्ट्री में सबसे लंबे कीसिंग सीन का दर्जा हासिल है।
शनिवार, 25 जनवरी 2014
अपने बच्चों का भी नाम रोशन किया इन्होने..
कुल का चिरा
ग पैदा हुआ है".... "अरे आपका बच्चा तो बड़ा समझदार है ये ज़रूर माँ-बाप का नाम रोशन करेगा"..... ऐसे जुमले और बधाइयाँ अपने भी सुनी और दी होंगी॥ मगर क्या ये बातें हमेशा सच होती हैं॥ क्या सिर्फ़ बच्चे ही माँ-बाप का नाम रोशन करते हैं?? अगर ये बात आपको सही लगती है तो ज़रा इन् नामों पर गौर फरमाइए महात्मा गाँधी, किरण बेदी, लाल बहादुर शास्त्री, हेमा मालिनी, राजेंद्र कुमार, देव आनंद, डिम्पल कपाडिया और राजेश खन्ना॥ उदहारण देने के लिए नाम और भी हैं जोकि इस बात को सिरे से नकारते हैं की सिर्फ़ बच्चे ही माता-पिता नाम रोशन करते हैं॥ जबकि तस्वीर का दूसरा पहलु ये भी कहता है की कुछ माता-पिता भी गुंणों की ऐसी पारसमणि लेकर पैदा होते हैं जिसकी चमक आने वाली कई पुश्तों का नाम रोशन करती है॥
चलिए बात शुरू करते हैं राष्ट्र पिता महात्मा गाँधी से, जिनके बारे में मैं दावे के साथ कह सकती हूँ की दुनिया भर में शायद ही कोई ऐसा बदकिस्मत देश हो जिसके लोगों ने अहिंसा के इस पुजारी का नाम न सुना हो॥ और ये बात भी मैं दावे के साथ कह सकती हूँ की अपने ही देश में शायद चंद ही ऐसे खुशकिस्मत लोग होंगे जिन्होंने बापू के चारों बेटों के नाम सुने होंगे॥ हीरालाल, मणिलाल, रामदास और सबसे छोटा देवदास, ये वो नाम हैं जो तभी चमकते हैं जब इनके साथ मोहनदास गाँधी लिखा हो॥ जी हाँ ये चारों हमारे राष्ट्र पिता की संतानों के नाम हैं॥
चलिए आगे बढ़ते हैं और बात करते हैं "जय जवान जय किसान" का अमर नारा देने वाले भारत के तीसरे प्रधानमंत्री यानि श्री लाल बहादुर शास्त्री जी की॥
जिनका नाम सुनके आज भी हम सबकी आंखे आदर से झुक जाती हैं उनके सुपुत्र अनिल और सुनील शास्त्री॥ देशवासियों को इनसे मुखातिब होने का मौका शास्त्री जी की पुण्य तिथि पर ही मिलता होगा॥ इसके बाद बात करते हैं भारत की प्रथम महिला आईपीएस अधिकारी डॉ किरण बेदी॥ जिन्हें मिली सफलता और अवार्ड्स की लिस्ट बनाने बैठो तो ये एक लेख भी कम पड़ जाएगा॥ आज किरण को देश का हर बच्चा, जवान जानता है मगर उनकी सुपुत्री साइना का नाम बच्चे तो छोडिये शायद बड़े भी नही जानते होंगे॥चलिए अब थोडी सी करवट लेते हैं और देखते हैं की फ़िल्म इंडस्ट्री के दिग्गजों मैं से किस-किस ने अपने नौनिहालों का नाम रोशन किया है॥ सबसे पहले मुझे नाम याद आ रहा है ड्रीम गर्ल हेमा मालिनी का॥ जिनकी बड़ी बेटी ईशा देओल के कपडे ज़्यादा छोटे हैं या उनकी फिल्मों की बॉक्स ऑफिस कोल्लेक्शन ये कहना ज़रा मुश्किल काम है॥ जबकि वहीँ दूसरी तरफ़ हेमा हैं की उम्र में ६० का आंकडा छूने के बावजूद भी अपने दर्शकों के सपनो में आना नही छोड़ा उन्होंने॥ देव आनंद साहब के साहबजादे सुनील आनंद को शायद राशन कार्ड दफ्तर या पासपोर्ट ऑफिस के
लोग भी नहीं पहचानते होंगे॥ डिम्पल और राजेश खन्ना की बेटियाँ ट्विंकल और रिंकी खन्नाको भी वि.आई.पी का दर्जा पाने के लिए अपने माता-पिता के ही नाम का सहारा है॥ इस कड़ी में एक और ख़ास नाम मैं ज़रूर लेना चाहूंगी वो है अपने ज़माने में "जुबली कुमार" के नाम से मशहूर रहे राजेंद्र कुमार॥ जिनके सुपत्र कुमार गौरव ने पिता से उलट दिशा में जाके बतौर सुपर फ्लॉप हीरो इतिहास रचा॥ ऐसे ही मनोज कुमार, माला सिन्हा, वैजन्ती माला, राज कुमार, प्रेम नाथ, महमूद और प्राण॥ ऐसे कितने ही नाम हैं जिन्होंने अपने बच्चों के पैदा होने पर "कुल का चिराग पैदा हुआ है" ये बधाइयाँ तो बहुत बटोरी होंगी मगर उस वक़त शायद उन्हें भी इस बात का अनुमान नही होगा की आने वाली कई पुश्तों के नाम को अपने से ज़यादा उनके नाम की रोशनी का इस्तेमाल करना पड़ेगा॥ शायद किसी ने सच ही कहा है.....किस्मत बनानेवाले तुने कमी न की, अब किसको क्या मिला मुकद्दर की बात है......
नाम में क्या रखा है??
फ़िल्म और टेलीविजन की दुनिया में कुछ नियम ऐसे हैं जो वर्षौ से निभाए जा रहे हैं और आने वाली कई सदियों तक बिना किसी फेर बदल के निभाए जाते रहेंगे। पत्थर पर खिंची लकीर की तरह इन नियमों में एक अहम् नियम है किसी फ़िल्म या धारावाहिक के किरदारों का सरनेम यानि उपनाम रखना। किसी भी फ़िल्म अथवा धारावाहिक में तीन तरह के किरदार होते हैं। एक वो जो ईमानदार, भावुक, सहनशील और त्याग की प्रतिमूर्ति होते हैं। इस तरह के किरदारों के उपनाम में शर्मा, माथुर, गुप्ता, उपाध्याय, दिक्षित जैसे उपनामों को प्रमुखता दी जाती है। पता नही क्यों कहानीकारों यानि लेखकों को इन् उपनामों में बेचारगी, आंसुओं और आत्मसम्मान का मिक्सचर दिखाई देता है?? हालाँकि असल ज़िन्दगी में इन बिरादरियों में भी अच्छे बुरे सभी तरह के लोग पाए जाते हैं। पर मनोरंजन जगत ने कब, कैसे और क्यों इन जातियों का सम्बन्ध सीधे-साधे, त्यागशील या न्याय के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले लोगों के साथ जोड़ दिया इसका कोई उत्तर मुझे आज तक समझ नहीं आया। चांदनी फ़िल्म में श्री देवी का नाम चाँदनी माथुर, कुछ कुछ होता है में काजोल बतौर अंजलि शर्मा, खाकी का डी सी पी अनंत श्रीवास्तव टेलीविजन धारावाहिक में कितनी मुहोब्बत है की मुख्य किरदार आरोही शर्मा-ये कुछ ऐसे उदाहरण हैं जो इस वक्त मेरे मस्तिष्क के दरवाज़े पर दस्तखत दे रहे हैं।फ़िल्म और धारावाहिकों की दुनिया में दूसरी किस्म के लोगों में वो किरदार आते हैं जो रईस, रोबदार या फिर खलनायक का चोला पहन के अवतरित होते हैं। इन किरदारों को खरबंदा, वाधवा, चौहान, अग्रवाल, ओबराय, खुराना, खन्ना, वीरानी, चौधरी जैसे वज़नदार उपनामों का धुरी पर घुमाया जाता है। क्योंकि उस किरदार को हमेशा अपने खानदान की इज्ज़त, रुतबे का ऐलान करना होता है ऐसे में वीरानी खानदान, चौधरी परिवार, वधवा फॅमिली आदि शब्दों का प्रयोग कहानी के पात्र की ऊँची आन-बान और शान को अनायास ही स्थापित करने में सहायता करते हैं। फिल्म कुछ कुछ होता है में राहुल खन्ना, चाँदनी का रोहित अग्रवाल, अग्निपथ का विजय दिना नाथ चौहान, बाबुल में बलराज कपूर, और टेलीविजन धारावाहिकों के पूर्वज क्योंकि सास भी कभी बहु थी का वीरानी परिवार, कुमकुम का वाधवा खानदान, कहानी घर घर की का अग्रवाल परिवार और नई फसल में बंदनी का माहियावंशी परिवार आदि वो उदाहरण हैं जो छोटे-बड़े परदे की कहानी के तयशुदा नियमों पर खरे उतरते हैं।
आख़िर में बात करते हैं छोटे-बड़े परदे के मसखरों यानि हंसने-हँसाने वाले किरदारों की। तो इनके लिए ज्यादातर उपनामों के झमेले में पड़ने की बजाये इनके सिर्फ़ नाम पर ही ध्यान दिया फिर भी। फूल एंड फाइनल का किट्टू पाइलेट, हम आपके हैं कौन में लल्लू, आवारा पागल दीवाना का छोटा छतरी। फिर भी अगर कभी इन्हे उपनामों से नवाजना पड़े तो ज्यादातर दारूवाला, पोपट, चिटनिस, गंसोल्वेस, खोटे, गोडबोले, पिल्लै, सिद्धू, सिंह, यादव, पांडुरंग, आदि उपनामों की लक्ष्मण रेखा के भीतर ही हर लेखक के दिमाग का घोड़ा चक्कर काटता दिखाई देता है।
इस बे-सर पैर के नियम का पालन क्यों किया जाता है पता नहीं। मगर हैरानी की बात ये है की कहानी, किरदार और घटनाओं में नवीनता खोजने वाले लेखकों का खोजी दिमाग कभी भी इस नियम के विरूद्ध जाने का खतरा मोल नहीं लेता।
बहरहाल असल ज़िन्दगी में कोई भी धर्म, जाति या बिरादरी ऐसे किसी नियम से बंधी हुई नही है क्योंकि अगर ऐसा कोई नियम होता तो ऋषि पुलस्त्य के यहाँ राक्षस बुद्धि रावन का जन्म नहीं होता है और राक्षस राज हिरणाकश्यप के यहाँ श्री हरि के परम भकत प्रह्लाद अवतरित न हुए होते।
शनिवार, 8 मई 2010
तेरे पास कौन सी माँ है भाई - "मदरइंडिया" की नर्गिस या "शूटआउट" की अमृता सिंह??

भाई, मेरे पास “माँ” है!!
कानूनी ढंग से कमाई काली दौलत के दम पर ऐशो आराम की ज़िन्दगी जीना पसंद करता है और दूसरा तंगहाली मगर इमानदारी के रास्ते पर चलकर खुद को धन्य समझता है और वो माँ भी अपने दूसरे बेटे के साथ फटे हाल ज़िन्दगी गुज़ारना ज़यादा पसंद करती है।
माँ को अपने बेटे की जीत पर भरोसा है इसलिए वो अपने खानदानी कंगन बेटे को देते हुए कहती है कि जाके ये कंगन मेरी बहु को दे देना। बुधवार, 31 मार्च 2010
दिल मिला है कहाँ कहाँ तन्हा : मीना कुमारी
कहते हैं कि कोई भी इंसान मुजरिम या गुनेहगार पैदा नहीं होता। वक़्त और हालत उससे गुनेहगार बना देते हैं। लेकिन औरत की ज़िन्दगी का सच इसके बिलकुल विपरीत है क्योंकि औरत को हालत या वक़्त गुनेहगार बनाये या न बनाये लेकिन औरत का होना ही अपनेआप में एक बड़ा गुनाह बन जाता है जिसकी सज़ा कई बार उसे बचपन के पालने से लेकर मौत की आगोश में समां जाने तक भुगतनी पड़ती है। औरत किसी भी देश-काल-वर्ग का हिस्सा क्यों न हो उसका जीवन कहीं भी आसान नहीं होता। वो इस धरा खंड के किसी भी हिस्से में रहती हो दुनिया उसकी परीक्षा कहीं भी, कभी भी ले सकती है फिर वो औरत मिथिला की धरती से जन्मी भगवती सीता हो या फिर फ़िल्मी दुनिया के आकाश पे चमकता कोई रोशन सितारा।1 अगस्त 1932 को इस दुनिया में एक ऐसे ही सितारे ने जन्म लिया जो पैदा, हुई तो उसकी रोशनी किसी ने न देखी। खुर्शीद और मधु इन दो बेटियों के बाद पैदा हुए इस सितारे को एक बोझ समझ कर यतीम आश्रम में पहुंचा दिया गया। फिर जाने क्या सोच के उस बोझ को उसके माता पिता उस यतीम खाने से वापिस घर ले आये। महज़ 7 साल के बाद उस बोझ को उसके औरत होने के गुनाह की सज़ा सुनाई गयी और वो सज़ा थी कि वो बोझ अब अकेले सारे परिवार का बोझ उठाये।
ये सितारा जिसे इसके अपनों ने एक बोझ समझा इसका नाम था महजबीं बानो उर्फ़ मीना कुमारी । महज़ 7 साल कि उम्र में महज़बीं ने पहली बार कमरे का सामना किया था। मुंबई के अँधेरी स्थित प्रकाश स्टूडियो में निर्देशक विजय भट्ट के लाइट्स, कैमरा, एक्शन बोलने के बाद जब दृश्य पूरा हुआ तो मानो नन्ही महज़बीं के रूप में परिवार को सोने का अंडा देने वाली मुर्गी हासिल हो गयी| बचपन के गलियारों में स्कूल जाने की ख्वाहिश रखने वाली महजबीं एक स्टूडियो से दुसरे स्टूडियो का सफ़र तय करते करते ही महजबीं से मीना कुमारी बन गई।
"मीना कुमारी" वो रोशन सितारा जिसकी अपने ही मन के चिराग तले हमेशा अँधेरा रहा। मीना का बचपन अपनी पूरी उम्र जीने से पहले ही खत्म हो गया। जवानी आई लेकिन परिवार की आर्थिक जरूरतों को पूरा करने कि ज़िम्मेदारी के कारण मीना के सपने कभी उसकी जिम्मेदारियों की लक्ष्मण रेखा पार न कर सके। माँ-बाप को उसके होने की ख़ुशी तब तक नहीं हुई जब तक फिल्म इंडस्ट्री की नजर उस कोहेनूर हीरे पर नहीं पड़ी और वह परिवार की रूठी तक़दीर को मानाने का जरिया नहीं बन गई। इस सचाई को मीना भली भांति जानती थी यही वजह थी के आँसू, दर्द और अकेलेपन से मीना कुमारी की दोस्ती किशोरावस्था में ही हो गयी थी।
कच्ची उम्र में गम और अकेलेपन से दोस्ती इंसान को अक्सर गलत निर्णय लेने पर मजबूर कर देती है। अभिनय, भावनाओं और शायरी की अच्छी खासी समझ रखने वाली मीना ने भी एक गलत निर्णय लिया और अपने से १५ साल बड़े एक विवाहित पुरुष "कमाल अमरोही" जो तीन बच्चों के पिता भी थे उनसे छिपकर शादी कर ली। मगर दर्द और तन्हाई उसके सच्चे दोस्त थे उन्होंने किसी भी सूरत में उसका साथ नहीं छोड़ा। प्यार, परिवार की आस लिए कमाल की ज़िन्दगी में दाखिल हुई मीना कुमारी के अरमान बस चंद घडी के मेहमान साबित हुए। कमाल अमरोही ज्यादातर बाहर रहते, मगर मीना के पल-पल की खबर रखी जाती । मीना के साथ प्यार के दो बोल बोलने वाला कोई न था।
उन तमाम पलों की गवाह सिर्फ एक नौकरानी थी, जिसने करोड़ों दर्शकों के दिल की मल्लिका और अपने दौर की सबसे नामी अदाकारा को बंद दरवाजों के पीछे घुटते-तड़पते देखा था।
अपने ३० साल लम्बे फ़िल्मी जीवन में मीना कुमारी ने लगभग ९० से अधिक फिल्में की। जहाँ एक ओर आज़ाद, चिराग कहाँ रोशनी कहाँ, मैं चुप रहूंगी, आरती, दिल एक मंदिर, फूल और पत्थर और दिल अपना और प्रीत परायी फिल्मों की सफलता ने मीना का नाम अपने वक़्त की बेहतरीन अदाकाराओं में शामिल कर दिया। वहीँ दूसरी तरफ बैजू बावरा, परिणीता, काजल फिल्मों में मीना के लाजवाब अभिनय ने उनकी झोली फिल्म फेअर अवार्ड से भर दी। और गुरुदत्त निर्मित साहिब, बीवी और गुलाम मीना के कैरिअर में मील का पत्थर मानी जाती है लेकिन इस फिल्म ने मीना को प्रशंसा और फिल्म फेअर अवार्ड्स के आशीर्वाद के साथ साथ शराब के नशे का श्राप भी दिया ।
मीना कुमारी ने आज़ाद, मिस मैरी और शरारत जैसी हास्य प्रधान फिल्में भी कि लेकिन उनके द्वारा निभाए गए ग़मगीन और संजीदा किरदारों ने उन्हें "ट्रेजिडी क्वीन" के नाम से मशहूर कर दिया।
जो भी हो शराब ने मीना को मानसिक और शारीरिक दोनों तरह से कमज़ोर कर दिया। उनकी बेदाग खूबसूरती समय से पहले ढलने लगी। उनकी आखिरी फिल्मों में "दुश्मन" और "मेरे अपने" में मीना कुमारी ने एक ढलती उम्र की औरत का किरदार निभाया और प्रशंसा हासिल की।
ज़िन्दगी और मौत की देहलीज़ पर खड़ी मीना की आखिरी फिल्म "पाकीज़ा" थी। जिसे पूरा होने में १४ सालों से भी ज्यादा वक़्त लगा। कहते हैं कि इस फिल्म निर्माण के दौरान ही मीना और कमाल अमरोही में तलाक हुआ था। तलाक कि चुभन को मीना ने अपने ही अंदाज़ से कुछ यूँ बयां किया था .......
तलाक तो दे रहे हो नज़रे कहर के साथ, जवानी भी लौटा दो मेरी मेहर केसाथ
इधर फिल्म "पाकीज़ा" ने सिनेमा हाल की देहलीज़ पर कदम रखा और उधर मौत ने मीना कुमारी की देहलीज़ पार की। मीना को करीब से जानने वालों का कहना है कि आखिरी वक़्त करोड़ों दिलों की इस मल्लिका के पास सिवाय आंसुओ, टूटे सपनो और अधूरी ख्वाहिशों के कुछ भी न था। मेह्ज़बिं की ज़िन्दगी का फसना मीना कुमारी ने अपनी कलम से कुछ इस तरह बयां किया ॥चाँद तन्हा है, आसमां तन्हा,
दिल मिला है कहाँ कहाँ तन्हा
बुझ गई आस, छुप गया तारा,
थर-थराता रहा धुआ तन्हा
ज़िन्दगी क्या इसी को कहते है
जिस्म तन्हा है, और जां तन्हा
हमसफ़र कोई ग़र मिले भी कहीं
दोनों चलते रहे यहाँ तन्हा
जलती बुझती सी रौशनी के परे,
सिमटा-सिमटा सा एक मकां तन्हा
राह देखा करेगा सदियों तक
छोड़ जायेंगें ये जहाँ तन्हा....
मंगलवार, 30 मार्च 2010
फिल्मों का बदलता स्वरुप यानि बदलते भारत की तस्वीर..
अंग्रेजी में एक कहावत है “चैज इज़ द ओनली कांस्टेंट यानि "परिवर्तन संसार का नियम है" और ये बात बदलते भारत पर इस वक़्त बिलकुल सटीक बैठती है । राजनीती में बाबा रामदेव जी का पदार्पण, स्वास्थ्य जगत में अचानक होमियोपथी, आयुर्वेदि चिकित्सा पद्दति को बढावा देने की सरकारी मुहीम, और फिल्मों में तो ये परिवर्तन इतनी तेज़ी से आ रहा है कि एक से दुसरे शुक्रवार के बीच रिलीज़ होने वाली फिल्मे मानो सदियों का फासला तय कर लेती हैं।
जैसे पकी पकाई फ़िल्मी जोड़ियों को लेकर फिल्में बनाने की जगह नयी जोड़ियों को फिट किया जा रहा है अतिथि तुम कब जाओगे में अजय देवगन और कोंकना सेन शर्मा या इश्किया में विद्या बालन और अरशद वारसी की जोड़ी इस परिक्षण का जीता जगता उदाहरण है॥ मनोरंजन के नाम पर फूहड़ता और घिसी पिटी कहानियो का दौर भी अब लगभग अपनी आखिरी सांसे ले रहा है। यही वजह है कि कॉमेडी देखने वाले दर्शकों को भी जबरन ठूँसी हुई कॉमेडी की जगह एक स्तरीय कॉमेडी देखने को मिल रही है। हालाँकि अभी भी अधिकतर फिल्म निर्माता निर्देशक रंगीनियत के चश्मे से चीजों को देखने के लालच को तिलांजल इनही दे पाए हैं लेकिन निर्माता-निर्देशको कि एक नयी पौध सिग्नल पर रहने वाले उन भिखमंगों या फिर दो पहिये कि गाड़ी से चार पहिये कि गाड़ी तक ज़िन्दगी को धकेलने कि कोशिश करनेवाली मध्यम वर्गीय परिवार की कहानी (आने वाली फिल्म दो दुनी चार) को भी बेख़ौफ़ परोसने कि हिम्मत कर रहे हैं । प्यार की कसमें खा-खाकर अपनी जान तक देने वाले आशिकों की फिल्मों से हटके वर्तमान फिल्में हसीन वादों और सपनों से भी आगे जमीनी हकीकत से रू-ब-रू कराती हैं, जहाँ जिंदगी इतनी आसान नहीं होती । लेकिन इस बदलती सोच का सारा श्रेय सिर्फ निर्माता या निर्देशको को देना उचित नहीं होगा । इस बदलते परिवेष की ज़िम्मेदारी काफी हद तक आज के युवा वर्ग को भी जाती है । पहले फिल्मों में जहाँ आलीशान बंगले और बड़ी बड़ी गाड़ियाँ हुआ करती थी वही आज कि फिल्में तंग गलियों में सिसकती ज़िन्दगी कि सच्चाई से दर्शकों को रु-बी-रु करवा रही हैं। आज का दर्शक मायाजाल से निकल कर तंग गलियों के सफर का भी खुले दिल से स्वागत करता है। तारे ज़मी पर, ३ इडिअट्स , कुर्बान, थैन्क्यू माँ जैसी फिल्मो का आगमन बदलती सोच और समाज का सन्देश देती हैं। आज कि फिल्मो और निर्देशको में सामाजिक सच दिखाने का माद्दा है। ये बदलती सोच ही बदलते वक़्त और भारत की ज़रूरत है।
लेकिन सिर्फ फिल्में ही नहीं बल्कि शिक्षा, व्यवसाय और तकनीक को भी बदलते दौर के साथ खुद को तेज़ी से बदलना होगा तभी भारत को विश्व गुरु कहलाने का गौरव हासिल होगा।
सोमवार, 29 मार्च 2010
फ़िल्मी सितारे : उनकी आस्था और विश्वास..
कलियुग में भगवान होने कि परिभाषा बदल गयी है। राजा होने के मायने बदल चुके हैं। आज भगवान वो है जिसके भाषण से राशन मिले न मिले लेकिन सोसाइटी में सत्संगी होने कि इमेज से ही लोग खुद को धन्य समझते हैं। राजा होने का अर्थ सही मायने में सरकारी गाड़ियों का काफिला, जनता कि भलाई के नाम पर मिली रकम से स्विस बैंक का भला करने से ज़यादा कुछ नहीं।फिर भी कलियुग में एक चीज़ नहीं बदली वो है उस मालिक या ईश्वर के दरबार में हाजिरी लगाने वालों कि आस्था और विश्वास । उसके दरबार में लगने वाली लाइनों को ज़रूर वी.आई.पी या साधारण जनता के आधार पर बाँट दिया जाता है लेकिन उसके सामने खड़े होने के बाद कोई सेलेब्रिटी हो या आम इंसान दोनों के हाथ एक ही अंदाज़ में जुड़ते हैं, दोनों की ही प्रार्थना तब तक स्वीकार नहीं होती जबतक उसकी आत्मा की आवाज़ उसमें न शामिल हो॥
मायानगरी में रहने वाले सितारों के नाम से चाहे जितने मंदिर और चालीसों की रचना कर दी जाये लेकिन फ़िल्मी फलक पर चमकने वाले ये सितारे भी उस परमेश्वर के दरबार में एक साधारण इंसान की तरह ही अपने और अपनों के दुःख को सुख में बदलने की गुज़ारिश करते हैं। और ये गुज़ारिश करने केलिए इस सितारों को अपना वी आई.पी.स्टेटस भूल कर भगवान की शरण जाना पड़ता है।
समय-समय पर हुई मुलाकातों के दौरान मुझे ये पता चला की इस दुनिया के रंगीन सितारे अपनी इस चकाचौंध कर देने वाली रोशनी, प्रसिद्धि और दौलत का श्रेय उस दुनिया की किस शक्ति देते हैं??
दुर्गा माँ के परम भक्तों में अक्षय काजोल, सुष्मिता, बिपाशा नवरात्रों में देवी के दरबार में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाना नहीं भूलते। यहाँ तक कि खिलाडी अक्षय तो ज़्यादातर नमस्ते, हाय, हेलो की जगह "जय माता दी" कहना ही पसंद करते हैं।
सुष्मिता सेन जब भी कोलकाता जाती हैं तो दखिनेश्वर और कालीघाट के मंदिर जाना नहीं भूलती । अफवाहों के करीब और मीडिया से दूर रहने वाली रानी मुखर्जी ईश्वर को अपने सबसे करीब मानती हैं और जब भी मौका मिले ये मुंबई के सिद्धिविनायक मंदिर और गोरेगाँव स्थित काली मंदिर जाती हैं।
विवेक ओबरॉय और विद्या बालन की सफलता, अभिनय में तो कोई समानता नहीं लेकिन इनकी धार्मिक आस्था और विश्वास ज़रूर एक सामान हैं क्योकि दोनों को ही शिर्डी के साँईंबाबा में अटूट श्रद्धा है। तिरुपति बाला जी और श्री सिद्धिविनायक बच्चन परिवार की आस्था का केंद्र हैं। ड्रीम गर्ल हेमा मालिनी और उनकी दोनों बेटियां की आस्था श्री कृष्ण चरणों में समर्पित है। संजय दत्त ने चाहे पत्नी कितनी भी बदली हों लेकिन माँ भगवती के प्रति उनकी आस्था औरश्रद्धा कभी नहीं बदली।
तुषार कपूर अपने भक्तिभाव को जग जाहिर करने में ज्यादा विश्वास नहीं करते बस घर में अगर हवन-पूजा हो तो उसमें हाजिरी लगा के वो ईश्वर के दरबार में अपनी इच्छाओं की लिस्ट पेश कर देते हैं। लेकिन ऐसा नहीं है के उन्हें भगवन में विश्वास नहीं बस वो अपने और भगवन के इस रिश्ते को अपनी बहन एकता की तरह जग जाहिर नहीं करते।
तो कुल मिला के नतीजा ये है के इस दुनिया के सितारे भी हमारी ही तरह सूख-दुःख की आंधियों से परेशां होते हैं। उन्हें भी एक आम इंसान की तरह मुश्किल की घडी में एक अदृश्य शक्ति की ज़रूरत महसूस होती है। लोगों कि दीवानगी चाहे इन्हें फलक के सितारे से ज़यादा रोशन और ताकतवर समझके इनकी पूजा, आराधना करना शुरू कर दे लेकिन सच येही है कि आखिर हैं तो ये भी इंसान ही।
मंगलवार, 5 जनवरी 2010
है कोई इनका वारिस ??
चारों तरफ़ मंदी की मार का शोर है॥ हर कोई परेशान है कि आखिर नौकरियां गई कहाँ॥ मगर मुझे ये सोच के ताज्जुब हो रहा है कि हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्री में आज भी कई पोस्ट सालों से खाली हैं जिनका कोई भी उम्मीदवार नहीं हैं॥ सोच के देखिये कि हर दूसरी फ़िल्म में पुलिस इंसपेक्टर का किरदार निभाने वाले कलाकार की कुरसी जोकि जगदीश राज के निधन के बाद खाली हो गई थी क्या आजतक उसका कोई दावेदार हमारी इंडस्ट्री में पैदा हुआ?? डांसिंग क्वीन हेलन के बाद आज कौन है जो "मोनिका ओ माय डार्लिंग" कि धुन पर बेपरवाह थिरक सके?? और अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा को जीता कर विश्व इतिहास रचेयता का श्रेय पाने वाले महावीर बजरंगबली कि भूमिका को अपने ही एक अलग शाही पंजाबी अंदाज़ में निभाने वाले दारा सिंह की पदवी का भी कोई वारिस दूर-दूर तक दिखाई नही देता॥ खैर जिन लोगों के नाम मैंने लिए उनसे आप सभी परिचित हो ये ज़रूरी नही है॥ तो चलिए इन सभी को ज़रा करीब से जानने कि कोशिश करते हैं हो सकता है मेरी इस कोशिश के बाद कोई इस और ध्यान दे और शायद इनकी जगह लेने का सपना किसी के मन में जागने लगे॥ तो लेडीज़ फर्स्ट के नियम कि अवहेलना न करते हुए शुरुआत करते हैं ५०, ६० और ७० के दशक में हिन्दी फ़िल्म के दर्शकों को अपना नाम "चिन चिन चुंग" बता कर सबका मन मोहने वाली हेलन रिचर्ड्सन से॥ जिन्हें हम सब सिर्फ़ हेलन के

नाम से ही जानते हैं॥ यूँ तो हिन्दी फिल्मों में हेलन का नाम बतोर खलनायिका, सह-अभिनेत्री और मुख्य अभिनेत्री यानि हर रूप में हम देखते आए हैं मगर हेलन को आज भी हिन्दी फिल्मों की सबसे ज़्यादा मशहूर आइटम ग
हेलन के बाद र्ल के रूप में ही याद किया जाता है॥ क्योंकि करीब ३०० फिल्मों में अपनी बेहतरीन अदाकारी का जादू चलने वाली हेलन ने ६५ से भी ज़्यादा फिल्मों में सिर्फ़ और सिर्फ़ आइटम सोंग के लिए ही अपनी मुह दिखाई की थी॥
मुझे याद आ रही है मुंबई पुलिस की॥ ६० व् ७० के दशक में अगर किसी हिन्दी फ़िल्म में पुलिस ऑफिसर का किरदार निभाने कि बात आती तो उसके लिए स्क्रीन टेस्ट या या ज़्यादा सोच-विचार करने कि शायद ही नोबत आती होगी क्योंकि इस भूमिका को बार -बार निभाते हुए जगदीश राज इस कदर टाइप हो चुके थे कि शायद उन्होंने भी किसी फ़िल्म का ऑफर आने पर ये पूछना छोड़ दिया होगा की फ़िल्म में उनका किरदार क्या है?? यही वजह है कि करीब २३६ फिल्मों में से १४४ बार जगदीश राज सिर्फ़ पुलिस इंसपेक्टर कि भूमिका में ही दिखाई दिए॥ जोकि अपने आप में एक विश्व रिकॉर्ड है॥
और अब बात करते हैं पंजाब दे पुत्तर रुस्तम-ऐ-हिंद दारा सिंह की॥ दारा सिंह जिनका नाम सुनते ही फ़िल्म और टेलीविजन पर उनके द्वारा साकार पवन पुत्र हनुमान का किरदार अपनेआप ज़हन में घूमने है॥ और शायद ये कहना ग़लत नही होगा कि दारा सिंह का नाम अब फिल्मी हनुमान जी के किरदार का प्रयाय्वाची बन चुका है॥ हालाँकि उनकी इस पदवी पर उनके सुपुत्र विदु ने कुछ वर्षों पहले अपनी

दावेदारी साबित करने कि कोशिश कि थी मगर पिता की लोकप्रियता के सामने बेटे की छवि का कद्द बोना साबित हुआ॥ दारा सिंह ने अबतक तक़रीबन १२० से भी ज़्यादा फिल्मों में अपनी अदाकारी का योगदान दिया है पर उनका सबसे बड़ा योगदान रहा धार्मिक हिन्दी फिल्मों में निभाई उनकी अलग-अलग भूमिकाएं॥ गौरतलब है कि अपने अब तक के अभिनय सफर में वह ५ बार बजरंगबली, 4 बार भीम, ३ बार भगवन शिव और एक बार भीम पुत्र घटोत्कच का किरदार निभा चुके हैं॥ मगर आज भी बजरंगबली के फिल्मी अवतार का नाम आते ही दारा सिंह ही हनुमान रूप दिखाई देने लगते हैं॥
ये जीतनी भी खाली पोस्ट के बारे में मैंने आपको जानकारी दी है इनके शहंशाहों ने वर्षों पहले ही अपने सिंघासन को खाली कर नई पीढी को उस पर विराजने का निमंत्रण दे दिया॥ मगर आज इतने सालों के बाद भी उस सिंघासन पर बैठना तो दूर कोई उस पायदान की पहली सीडी पर भी पाँव नही रख सका है॥ जो भी हो मुझे नही लगता इन खाली पड़े सिंघासनों को कभी कोई वारिस मिलेगा॥
शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2009
राज ठाकरे जी, ये क्या हो रहा है??
जब से राज ठाकरे ने "मराठा वाद" का राग छेड़ा है तब से मैं मुंबई में चलने वाली हवाओं में एक अजीब सा परिवर्तन देख रही हूँ। चुनावों में राज ठाकरे की पार्टी का जिस तरह सुपडा साफ हुआ वो तो खैर होना ही था लेकिन उसके पहले ही टेलिविज़न जगत ने जैसे कसम खा ली थी की अब सारे उत्तर-पूर्वी भारत को मुंबई में ला बसाना है। नतीजतन एकाएक बिहारी, पंजाबी, गुजरती, हरयाणवी, बंगाली कहानियों का एक हजूम सा टेलीविजन धारावाहिकों में उमड़ पड़ा है। और इस नई परम्परा के चलते उत्तर-पूर्वी भाषाओँ में पकड़ रखने वाले कलाकारों को मानो दूरबीन के द्वारा ढूँढा जा रहा है। बच्चों से लेकर बूढों तक के किरदार के लिए कहीं बिहारी तो कहीं हरयाणवी, पंजाबी, गुजराती कलाकारों की चाँदी हो रही है। हर एक चनैल अपने-अपने प्राइम टाइम को और ज़यादा कमाऊ पूत बनाने के लिए उत्तर-पूर्वी भारत के परिदृश्य पर आधारित कहानियों, किरदारों और भाषा का तड़का लगाने में व्यस्त है। कलर्स टीवी पर जहाँ एक और "बालिका वधु" राजस्थान की सुनहरी रेत पर अपनी सफलता का इतिहास रच रही है वहीं "न आना इस देस लाडो" में सभी कलाकार हरयाणवी तेवरों से दर्शकों का मन मोह रहे हैं। एनडी टीवी पर "बंदिनी" ने गुजरात से अपना रिश्ता जोड़ लिया है तो ज़ी टीवी का बहु चर्चित धारावाहिक "छोटी बहु" में बनारस के घाट अपनी लोकप्रियता के परचम लहलहा रहे हैं। "अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो" की बिटिया ने राज ठाकरे के कट्टर दुश्मन बिहार की चुनरी ओढ़ के दर्शकों के दिलों में अपनी जगह बना ली है। यानि कुल मिला के जो चमत्कार टेलिविज़न के इतिहास में आज तक नही हुआ वो इत्तेफाकन अब हो रहा है। जी हाँ ये सब महज़ एक इतेफाक ही है मगर दिलचस्प इतेफाक कि जैसे ही राज ठाकरे ने "मराठा वाद" कि भट्ठी सुलगा के अपने राजनितिक कैरिअर कि रोटियां सकने का बंदोबस्त किया वैसे ही टेलीविजन पर "अनेकता में भी एकता की मिसाल" भारतीय संस्कृति का देस राग गूंजने लगा। जिसका हर एक सुर इतना सधा हुआ है कि आने वाले कई वर्षों तक ऐसे-ऐसे एक सहस्त्र राज ठाकरे मिल कर भी नाखून को मांस से अलग नही कर सकेंगे। जिन छोटी छोटी रियासतों को जोड़ कर अखंड भारत की नीव रखने वाले सरदार वल्लभ भाई पटेल ने "आयरन मैन" यानि लोह पुरूष का खिताब जीता था उस अखंड भारत की नीव को हिलाना किसी राज ठाकरे जैसे कलयुगी "जयचंद" के बस कि बात नहीं। इसलिए हर एक नेता को अभी से ये सबक ले लेना चाहिए कि भारतीय लोकतंत्र का मखोल उड़ने के दिन अब लद गए हैं। जनता का दिल जितने की एक ही "मास्टर की" है और वो है निस्वार्थ समाज सेवा। तो जो जो "नेता गण" भारत भाग्य विधाता बनने का सपना पाल रहे हैं वो अभी से निस्वार्थ सेवा का रास्ता अपना लें तो अगले चुनाव में उनकी जीत का विश्वास मैं उनको दिलाती हूँ। राज ठाकरे की पूर्व कारिस्तानियों से सम्बंधित एक और लेख पड़ने के लिए यहाँ दिए गए लिंक पर जायें:
http://kashmir-timemachine.blogspot.com/2009/01/w-hen-i-was-thinking-of-going-to-bed.html
रविवार, 19 अप्रैल 2009
टीआरपी बढ़ रही है पर कृष्ण जी नहीं..

मुरली मनोहर, कृष्ण कन्हैया, नन्द किशोर, रणछोर, गोविन्द, गोपाल, माखनचोर और भी न जाने कितने नाम हैं माँ यशोदा के लाडले कृष्ण कन्हैया के। उस बंसीधर को आज एक नाम मैं भी दे रही हूँ और उनका ये नया नाम है "टीआरपी चोर"। जी हाँ जब से इस नन्हे नटखट का अवतरण कलरस चैनल पर हुआ है तभी से इन्होने बाकी सिरिअल की "टीआरपी" पर चुपके से हाथ साफ करना शुरू कर दिया था। मगर गोकुल के कृष्ण कन्हैया को माखन चुराने में ख़ुद कोई नुक्सान नही उठाना पड़ा था जबकि यहाँ उन्हें "टीआरपी चोर" बनने के बाद अच्छी-मशकत करनी पड़ रही है। और सबसे बड़ा हर्जाना ये है की बढती "टीआरपी" के चलते उनकी उम्र बढ़नी लगभग बंद हो चुकी है। अब नतीजा ये की लीलाधर ने अपनी जिन लीलाओं का आनंद किशोरावस्था में लिया और अपने भक्तों को दिया उन्हें भी वह बाल्यावस्था में ही अंजाम दे रहे हैं। फिर वो चाहे देवराज इन्द्र का मान मर्दन करने के लिए गोवर्धन पर्वत को अनामिका पे उठाना हो या फिर गोपियों के वस्त्र हरण की लीला करनी हो ये सभी काम बढती "टीआरपी" के चलते उनसे बाल्यावस्था में ही करवाए जा रहे हैं॥गुरुवार, 26 मार्च 2009
सुरेखा सिकरी : इस चिराग तले अँधेरा कहाँ..
बहुत प्रसिद्ध कहावत है की चिराग तले अँधेरा होता है॥ मगर इस कहावत के भावार्थ को बदल के दिखाया है ६४ साल की दादीसा यानि सुरेखा सिकरी ने॥ सुरेखा और अभिनय मानो एक ही सिक्के के दो पहलु हैं॥ यही कारण है की सुरेखा को जब जहाँ जिस किरदार में भी देखा तो लगा की मानो यही असली सुरेखा हैं॥ टेलिविज़न पर तमस, सात फेरे या फिर बनेगी अपनी बात जैसे आधा दर्ज़न से भी भी ज़यादा धारावाहिकों में अपनी अदाकारी से दर्शको का मन मोह लेने वाली सुरेखा ने बड़े परदे पर भी अपने अभिनय और मौजूदगी से अच्छे-अच्छे कलाकारों के पसीने छुडाये हैं .. ज़ुबेदा, मम्मो, सलीम लंगडे पे मत रो आदि चाहे जिस फ़िल्म का नाम लीजिये और उसी वक्त सुरेखा यानि एक पर्फ़ेक्शिनिस्ट की ही छवि दिमाग में साकार होगी॥ कमाल की बात ये है की इस हरफनमौला, जिंदादिल कलाकार कीपारिवारिक पृष्ठभूमि में दूर-दूर तक किसी का भी अभिनय से कोई वास्ता नही रहा॥ फिर भी अपने काम के साथ इमानदार रहने की आदत ने सुरेखा को अभिनय की उस बुलंदी पर पहुँचा दिया है जहाँ छोटे-बड़े परदे का फरक ख़तम हो जाता है॥ गुरुवार, 19 मार्च 2009
बहु पिट चुकी अब बेटी की बारी..
देखिये सभी महिला मंडल और महिला अधिकार समितियों से मेरी गुजारिश है कि सिर्फ़ टाइट्ल पढके मेरे खिलाफ नारे लगाने से पहले पूरी बात जान लें.. ये वो पिटाई नहीं जहाँ लाठी, थप्पड़ या जूतों से
पिटाई की
जाए ये टीआरपी के जूतों से होने वाली पिटाई है॥ जहाँ न तो किसी के आंसू निकले हैं ना ही खून.. पर प्रोड्यूसर और चैनल को घटा होने पे दोनों खून के आंसू ज़रूर रोते हैं..

