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शनिवार, 25 जनवरी 2014

अपने बच्चों का भी नाम रोशन किया इन्होने..

"बधाई हो कुल का चिराग पैदा हुआ है".... "अरे आपका बच्चा तो बड़ा समझदार है ये ज़रूर माँ-बाप का नाम रोशन करेगा"..... ऐसे जुमले और बधाइयाँ अपने भी सुनी और दी होंगी॥ मगर क्या ये बातें हमेशा सच होती हैं॥ क्या सिर्फ़ बच्चे ही माँ-बाप का नाम रोशन करते हैं?? अगर ये बात आपको सही लगती है तो ज़रा इन् नामों पर गौर फरमाइए महात्मा गाँधी, किरण बेदी, लाल बहादुर शास्त्री, हेमा मालिनी, राजेंद्र कुमार, देव आनंद, डिम्पल कपाडिया और राजेश खन्ना॥ उदहारण देने के लिए नाम और भी हैं जोकि इस बात को सिरे से नकारते हैं की सिर्फ़ बच्चे ही माता-पिता नाम रोशन करते हैं॥ जबकि तस्वीर का दूसरा पहलु ये भी कहता है की कुछ माता-पिता भी गुंणों की ऐसी पारसमणि लेकर पैदा होते हैं जिसकी चमक आने वाली कई पुश्तों का नाम रोशन करती है॥

चलिए बात शुरू करते हैं राष्ट्र पिता महात्मा गाँधी से, जिनके बारे में मैं दावे के साथ कह सकती हूँ की दुनिया भर में शायद ही कोई ऐसा बदकिस्मत देश हो जिसके लोगों ने अहिंसा के इस पुजारी का नाम न सुना हो॥ और ये बात भी मैं दावे के साथ कह सकती हूँ की अपने ही देश में शायद चंद ही ऐसे खुशकिस्मत लोग होंगे जिन्होंने बापू के चारों बेटों के नाम सुने होंगे॥ हीरालाल, मणिलाल, रामदास और सबसे छोटा देवदास, ये वो नाम हैं जो तभी चमकते हैं जब इनके साथ मोहनदास गाँधी लिखा हो॥ जी हाँ ये चारों हमारे राष्ट्र पिता की संतानों के नाम हैं॥

चलिए आगे बढ़ते हैं और बात करते हैं "जय जवान जय किसान" का अमर नारा देने वाले भारत के तीसरे प्रधानमंत्री यानि श्री लाल बहादुर शास्त्री जी की॥ जिनका नाम सुनके आज भी हम सबकी आंखे आदर से झुक जाती हैं उनके सुपुत्र अनिल और सुनील शास्त्री॥ देशवासियों को इनसे मुखातिब होने का मौका शास्त्री जी की पुण्य तिथि पर ही मिलता होगा॥ इसके बाद बात करते हैं भारत की प्रथम महिला आईपीएस अधिकारी डॉ किरण बेदी॥ जिन्हें मिली सफलता और अवार्ड्स की लिस्ट बनाने बैठो तो ये एक लेख भी कम पड़ जाएगा॥ आज किरण को देश का हर बच्चा, जवान जानता है मगर उनकी सुपुत्री साइना का नाम बच्चे तो छोडिये शायद बड़े भी नही जानते होंगे॥

चलिए अब थोडी सी करवट लेते हैं और देखते हैं की फ़िल्म इंडस्ट्री के दिग्गजों मैं से किस-किस ने अपने नौनिहालों का नाम रोशन किया है॥ सबसे पहले मुझे नाम याद आ रहा है ड्रीम गर्ल हेमा मालिनी का॥ जिनकी बड़ी बेटी ईशा देओल के कपडे ज़्यादा छोटे हैं या उनकी फिल्मों की बॉक्स ऑफिस कोल्लेक्शन ये कहना ज़रा मुश्किल काम है॥ जबकि वहीँ दूसरी तरफ़ हेमा हैं की उम्र में ६० का आंकडा छूने के बावजूद भी अपने दर्शकों के सपनो में आना नही छोड़ा उन्होंने॥ देव आनंद साहब के साहबजादे सुनील आनंद को शायद राशन कार्ड दफ्तर या पासपोर्ट ऑफिस के लोग भी नहीं पहचानते होंगे॥ डिम्पल और राजेश खन्ना की बेटियाँ ट्विंकल और रिंकी खन्नाको भी वि.आई.पी का दर्जा पाने के लिए अपने माता-पिता के ही नाम का सहारा है॥ इस कड़ी में एक और ख़ास नाम मैं ज़रूर लेना चाहूंगी वो है अपने ज़माने में "जुबली कुमार" के नाम से मशहूर रहे राजेंद्र कुमार॥ जिनके सुपत्र कुमार गौरव ने पिता से उलट दिशा में जाके बतौर सुपर फ्लॉप हीरो इतिहास रचा॥ ऐसे ही मनोज कुमार, माला सिन्हा, वैजन्ती माला, राज कुमार, प्रेम नाथ, महमूद और प्राण॥ ऐसे कितने ही नाम हैं जिन्होंने अपने बच्चों के पैदा होने पर "कुल का चिराग पैदा हुआ है" ये बधाइयाँ तो बहुत बटोरी होंगी मगर उस वक़त शायद उन्हें भी इस बात का अनुमान नही होगा की आने वाली कई पुश्तों के नाम को अपने से ज़यादा उनके नाम की रोशनी का इस्तेमाल करना पड़ेगा॥ शायद किसी ने सच ही कहा है.....

किस्मत बनानेवाले तुने कमी न की, अब किसको क्या मिला मुकद्दर की बात है......

शुक्रवार, 11 अक्टूबर 2013

जब बड़े ईमाम साहब ने की छोटी बात..

बात तब की है जब मैं आतंकवाद पर आधारित एक कार्यक्रम बना रही थी। दूरदर्शन पर प्रसारित होने वाले इस कार्यकर्म में मुझे आतंकवाद से सम्बंधित हर घटना में वो सबूत दर्शकों के सामने रखने होते थे जो ये साबित कर सकें की पड़ोसी मुल्क ही भारत में आंतकवाद को समर्थन और सहायता दे रहा है। काम मुश्किल था इसलिए हर एपिसोड के लिए खासी मशकत करनी पड़ती थी। हर आतंकवादी वारदात में मुजरिम पड़ोसी देश में बैठे अपने हुक्मरानों के साथ अपने ताल्लुकात होने के सबूत पीछे छोड़ के जाए ये ज़रूरी नही। इसलिए कई बार तथ्यों को साबित करने केलिए हमें सुरक्षा विशेषज्ञयों से भी बात की करनी पड़ती थी।
"जेहाद" के नाम पर बेकसूरों का खून बहाने वाले आतंकवादियों ने इस बार श्री नगर की एक मस्जिद को अपना निशाना बनाया था । जहाँ नमाज़ के वक्त बम्ब ब्लास्ट करके इन आतंकवादियों ने एक बार फ़िर ये साबित कर दिया था की उनका मुस्लिम अवाम, मज़हब और देश से कोई वास्ता नही है। "जेहाद" के नाम पर मज़हब को बदनाम करने वालों की पोल खोलने की एक और कोशिश मैं करना चाहती थी। इसलिए इसबार किसी सुरक्षा विशेषज्ञ की जगह एक मुस्लिम धर्म गुरु को अपने कार्यकर्म में शामिल करने का मैंने फ़ैसला किया। अपने इस फैसले को अंजाम देने केलिए मैंने दिल्ली की एक प्रमुख मस्जिद के बड़े ईमाम साहब से संपर्क किया ताकि उन्ही की ज़ुबानी अवाम तक "जेहाद" का असली मतलब पहुँच सके। और ख़ुद को मुसलमानों का खैरख्वाह कहनेवाले आतंकी दरिंदों के स्वार्थ का परदा फाश हो।
बड़े ईमाम साहब ने बखुशी मुझे और मेरी कैमरा टीम अपने घर आमंत्रित किया॥ दिल्ली के एक पुराने इलाके की तंग गलियों से होते हुए मैं और मेरी टीम तयशुदा वक्त पर बड़े ईमाम साहब के घर पहुँची। आदतन पहले मैंने उन्हें अपने कार्यकर्म और वर्तमान एपिसोड के बारे में विस्तार से बताया। उनसे बात करने के पीछे मेरा मकसद क्या है ये भी उन्हें बता दिया। इस साक्षात्कार में मेरा सबसे अहम सवाल था की क्या श्री नगर की मस्जिद पर हुए आतंकवादी हमले को "जेहाद" कहा जाएगा ??
मेरी कैमरा टीम अभी अपना कैमरा सैट कर रही थी इसलिए ईमाम साहब ने बेखौफ होके कहा कि "नही ये "जेहाद" नही है। जेहाद का मतलब होता है मज़हब की सुरक्षा, आत्म-सुरक्षा या किसी बेबस की सुरक्षा के लिए हथियार उठाना (मैं ये लेख "जेहाद" के मायने पर ववाद-विवाद करने कि मंशा से नहीं लिख रही हूँ, ये इमाम साहेब के लफ्ज़ हैं जिनको मैंने बिना किसी हेर-फेर के यहाँ लिखा है) अपनी बात जारी रखते हुए बड़े ईमाम साहब ने आगे कहा कि ख़ुदा की बंदगी करते मुसलमानों पर हमले को किसी भी सूरत में "जेहाद" का नाम नहीं दिया जा सकता। चंद मतलब परस्त लोग अपने स्वार्थ के लिए मज़हब के नाम पर ये फसाद पैदा कर रहे हैं। और मैं इसकी खिलाफत करता हूँ। (यहाँ एक बार फिर मैं याद दिलाना चाहूंगी कि ये सब बातें वो अभी कैमरा के सामने नहीं बोल रहे थे)"
उनके इस बयान से मैं संतुष्ट थी इसलिए मैंने कैमरा आन कर बड़े ईमाम साहब के सामने फिर से अपना वही सवाल दोहराया। मगर ये क्या इस बार ईमाम साहब ने मस्जिद पर हुए हमले की सिर्फ़ निंदा कि और बिना दम लिए उन्होंने अपनी बात को आगे बढाया कि "हमें ये भी देखना होगा के मस्जिद पर हमला करने वालों का मकसद क्या है, वो क्या चाहते हैं, इतने सालों से उनकी फरियाद कोई नहीं सुन रहा कहीं इसलिए तो उन्हें ये कदम नहीं उठाने पड़ रहे। कहीं हम लोग उनके साथ नाइंसाफी तो नहीं कर रहे?"
उनकी इस टिपण्णी को सुनके मैं और मेरा कैमरामन एक दुसरे कि तरफ़ हैरत से देखने लगे क्योंकि अभी चंद लम्हे पहले जब कैमरा आन नहीं था तब हमलोगों ने आतंकवाद के खिलाफ ईमाम साहब के सुरों का आरोह ख़ुद सुना था और अब कैमरा आन होते ही वही सुर अवरोह कि गति पकड़ रहे थे।

मैं परेशान थी कि आखिर ईमाम साहब किसका समर्थन कर रहे हैं?? आए दिन हो रहे हमलों में मारे जा रहे बेकसूर लोगों को बचाने का या जेहाद के नाम पर उन बेकसूरों के खून से होली खेलने वाले आतंकवादियों का? वो तो किसी को भी ग़लत नहीं कह रहे। खैर ईमाम साहब की बात ख़तम होते ही मैंने कैमरा बंद करवा कर उन्हें याद दिलाया की कैमरा आन होने से पहले उन्होंने आतंकवाद की खिलाफत के लिए कुछ और ब्यान दिया था। इस पर ईमाम साहब फिर से अपनी पुराणी टिपण्णी पर वापिस आ गए और मुझे लगा की शायद उन्हें मेरा सवाल समझने में गलती हूई होगी इसलिए कैमरा आन करके मैंने एक बार फिर उन्हें अपनी बात जनता के सामने कहने का मौका दिया। मगर इस बार फिर उनका जवाब राजनितिक गलियारों की प्रदूषित हवा का शिकार हो रहा था। और ईमाम साहब "ये भी ठीक और वो भी ठीक" के तीरों से मेरे सवालों के तरकश को ही भेदने की कोशिश कर रहे थे। इस तरह करीब आधा दर्जन से ज़्यादा बार ईमाम साहब ने शब्दों का हेरफेर करके ये साबित कर दिया की उनके दो सुर हैं एक की तान वो कैमरे के पीछे छेड़ते थे और दुसरे की कैमरे के आगे। मतलब साफ था की राजनीति या सियासत के मामले में सिर्फ़ संसद के गलियारों में शिरकत करने वालों को ही महारथ हासिल नहीं होती।
बहरहाल बड़े ईमाम साहब की कोइ भी टिका-टिपण्णी मेरे काम की नही थी। क्योंकि मुझे किसी राजनीतिज्ञ की नही ब्लकि एक धर्म गुरु के बयान की ज़रूरत थी जो "जेहाद" के नाम पर गुमराह होते नौजवान क़दमों को "जेहाद" का असली मायने बतायें, जो कौम पर लग रहे दाग़ को धोने में पहल कर एक मिसाल कायम करें।
मैंने और मेरी टीम ने आदर के साथ बड़े ईमाम साहब का शुक्रिया अदा किया और उनसे इजाज़त मांगी। जाते-जाते उन्होंने मुझसे पूछा "मोहतरमा मुझे उम्मीद है कि आप मेरे जवाब से संतुष्ट होंगी और देश के नौजवानों को सही दिशा दिखाने की आपकी मुहीम में मेरा भी योगदान रहेगा।"
मैंने बस हाँ में सर हिलाया जबकि मेरी कैमरा टीम जानती थी की इस वक्त मैं ईमाम साहब के शुक्रिया और मशवरे के बारे में नही बल्कि अपने अगले कदम के बारे में सोच रही हूँ। क्योंकि लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ यानि पत्रकारिता में किसी भी कीमत पर सच्चाई को अवाम के सामने पेश करने का जूनून हमें परेशानियों का सामना करने की ताकत देता है।
मैंने उसी वक्त दिल्ली की एक और बड़ी मस्जिद के ईमाम साहब से बात की और उनसे बिना वक्त जाया किए उसी समय मिलने कि इजाज़त मांगी। उनसे मिल कर मैंने उन्हें श्री नगर की मस्जिद में हुए हमले के बारे में उनकी आवाज़ अवाम तक पहुँचाने कि गुजारिश की ताकि "जेहाद" के नाम पर पथभ्रष्ट होते युवायों का मार्गदर्शन हो सके। मेरी बात सुन कर ईमाम साहब मुस्कराए, कुछ पल की चुप्पी के बाद उन्होंने कहा कि आप जो सच मुझसे सुनना चाहती हैं वो अगर मेरी जुबान से निकला तो मेरे साथ-साथ मेरे खानदान के लहू के कतरों तक को भी सुखा दिया दिया जाएगा। मगर मज़हब पर लग रहे इस दाग को अगर मेरे लहू के कतरे धो सकते हैं तो मैं इसे अल्लाह कि असली इबादत समझूंगा। उनके इस जज्बे को हम लोगों ने मन ही मन सलाम किया और ईमाम साहब ने कैमरा आन होते ही अपने शब्दों का मान रखा और आप सभी को ये जान के खुशी होगी की उनकी किसी भी टिपण्णी में राजनीती की दुर्गन्ध नहीं आ रही थी।

उनके साथ हुई बात-चित के बाद मेरे दिमाग में मोहम्मद इकबाल की रची ये पंक्तियाँ गूंज रही थी
"मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना हिन्दी हैं हम वतन हैं हिंदुस्तान हमारा"..

शनिवार, 10 जुलाई 2010

काँटों भरा ताज "ताज-ए-कश्मीर"..

राजनीती में यूँ तो हर कुर्सी का ताज काँटों भरा होता है लेकिन भारत के बाकी राज्यों के ताज में चुभने वाले कांटें उनमें लगे फूलों का हिस्सा होते हैं - जबकि जम्मू और कश्मीर के ताज में सिर्फ और सिर्फ काँटों कि चुभन का ही एहसास है क्योंकि इस ताज के चमन में फूल खिलना कई साल पहले ही बंद हो चुका है। जम्मू कश्मीर के युवा मुख्य-मंत्री उमर अब्ब्दुल्ला अपनी ताज पोशी के वक़्त इन काँटों को चुन के बाग़-ए -कश्मीर में रोज़गार, उन्नति, तरक्की के फूल खिलाने का सपना लेकर आये थे। लेकिन वहां की जनता और उमर अब्ब्दुल्ला आये दिन कश्मीरी अवाम के सुकून, विकास और कारोबार के दुश्मनों की चालों का शिकार हो रहे हैं। यहाँ तक की कुछ लोग ज़मीनी सच्चाई का विश्लेषण किये बिना उमर को अब तक का सबसे असफल शासक करार दे चुके हैं। शायद इन लोगों को डर है की कहीं उमर की आँखों में बसे सपने किसी दिन सच न हो जायें । ऐसे में मासूम लोगों की लाशों पर अपने राजनितिक मंसूबों की रोटियां सकने वालों की दुकानदारी बंद होने की नौबत भी आ सकती है।
"कश्मीर वचार" का ये नया पोस्ट कश्मीर घाटी के कल और आज के विश्लेषण पर ही आधारित है।

http://kashmir-timemachine.blogspot.com/2010/07/omar-honest-politician.html

मंगलवार, 30 मार्च 2010

फिल्मों का बदलता स्वरुप यानि बदलते भारत की तस्वीर..

अंग्रेजी में एक कहावत है “चैज इज़ द ओनली कांस्टेंट यानि "परिवर्तन संसार का नियम है" और ये बात बदलते भारत पर इस वक़्त बिलकुल सटीक बैठती है । राजनीती में बाबा रामदेव जी का पदार्पण, स्वास्थ्य जगत में अचानक होमियोपथी, आयुर्वेदि चिकित्सा पद्दति को बढावा देने की सरकारी मुहीम, और फिल्मों में तो ये परिवर्तन इतनी तेज़ी से आ रहा है कि एक से दुसरे शुक्रवार के बीच रिलीज़ होने वाली फिल्मे मानो सदियों का फासला तय कर लेती हैं।


जैसे पकी पकाई फ़िल्मी जोड़ियों को लेकर फिल्में बनाने की जगह नयी जोड़ियों को फिट किया जा रहा है अतिथि तुम कब जाओगे में अजय देवगन और कोंकना सेन शर्मा या इश्किया में विद्या बालन और अरशद वारसी की जोड़ी इस परिक्षण का जीता जगता उदाहरण है॥ मनोरंजन के नाम पर फूहड़ता और घिसी पिटी कहानियो का दौर भी अब लगभग अपनी आखिरी सांसे ले रहा है। यही वजह है कि कॉमेडी देखने वाले दर्शकों को भी जबरन ठूँसी हुई कॉमेडी की जगह एक स्तरीय कॉमेडी देखने को मिल रही है। हालाँकि अभी भी अधिकतर फिल्म निर्माता निर्देशक रंगीनियत के चश्मे से चीजों को देखने के लालच को तिलांजल इनही दे पाए हैं लेकिन निर्माता-निर्देशको कि एक नयी पौध सिग्नल पर रहने वाले उन भिखमंगों या फिर दो पहिये कि गाड़ी से चार पहिये कि गाड़ी तक ज़िन्दगी को धकेलने कि कोशिश करनेवाली मध्यम वर्गीय परिवार की कहानी (आने वाली फिल्म दो दुनी चार) को भी बेख़ौफ़ परोसने कि हिम्मत कर रहे हैं । प्यार की कसमें खा-खाकर अपनी जान तक देने वाले आशिकों की फिल्मों से हटके वर्तमान फिल्में हसीन वादों और सपनों से भी आगे जमीनी हकीकत से रू-ब-रू कराती हैं, जहाँ जिंदगी इतनी आसान नहीं होती । लेकिन इस बदलती सोच का सारा श्रेय सिर्फ निर्माता या निर्देशको को देना उचित नहीं होगा । इस बदलते परिवेष की ज़िम्मेदारी काफी हद तक आज के युवा वर्ग को भी जाती है । पहले फिल्मों में जहाँ आलीशान बंगले और बड़ी बड़ी गाड़ियाँ हुआ करती थी वही आज कि फिल्में तंग गलियों में सिसकती ज़िन्दगी कि सच्चाई से दर्शकों को रु-बी-रु करवा रही हैं। आज का दर्शक मायाजाल से निकल कर तंग गलियों के सफर का भी खुले दिल से स्वागत करता है। तारे ज़मी पर, ३ इडिअट्स , कुर्बान, थैन्क्यू माँ जैसी फिल्मो का आगमन बदलती सोच और समाज का सन्देश देती हैं। आज कि फिल्मो और निर्देशको में सामाजिक सच दिखाने का माद्दा है। ये बदलती सोच ही बदलते वक़्त और भारत की ज़रूरत है।


लेकिन सिर्फ फिल्में ही नहीं बल्कि शिक्षा, व्यवसाय और तकनीक को भी बदलते दौर के साथ खुद को तेज़ी से बदलना होगा तभी भारत को विश्व गुरु कहलाने का गौरव हासिल होगा।

शुक्रवार, 1 जनवरी 2010

मायावती का ब्राहमण प्रेम..

बात तब की है जब मुझे मीडिया में कदम रखे कुछ महीने ही हुए थे॥ मौका मिला सुश्री मायावती से नई दिल्ली स्थित उनके सरकारी आवास पर उनसे रु-ब-रु होने का॥

खुदको दलित और गरीबों की मसीहा कहने वाली, ५० करोड़ से ज़्यादा की सम्पति की मालकिन, पेशे से एक अध्यापिका रह चुकी बहुजन समाजवादी पार्टी की अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश की वर्तमान मुख्यमंत्री मायावती ने निर्धारित समय से महज़ १५ मिनट की देरी से आगमन किया॥ मगर माया का परिवर्तित रूप देखकर मैं चौंक गई॥ क्योंकि अभी कल तक तो उनके शातिर दिमाग के पीछे एक घोड़े की पूंछ हुआ करती थी (माफ़ कीजिये अंग्रेज़ी में "पोनी टेल" कहते हैं तो उसका हिन्दी अनुवाद घोडे कि पूंछ ही मुझे समझ आया) ॥ मगर उस दिन मैदान साफ़ था और पूंछ नदारद थी॥ पूछने पर पता चला की मैडम अपनी बहनजी वाली छवि से छुटकारा पाना चाहती थीं॥

माया की ये मंशा जान कर मेरे मन में एक ही विचार आया कि "दिल बहलाने को ग़ालिब ख्याल अच्छा" है॥ हमारी बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ या ब्राह्मन समाज और ऋषि मन्नू से माया को अपना कोई पुराना बैर याद आया ये बात आजतक मेरी समझ में नहीआई ॥ मेरे हर सवाल के जवाब में सिर्फ़ और सिर्फ़ ब्राहमणों और मन्नू वादी विचारों के परखचे उडाये जा रहे थे॥ जीतनी सभ्य गालियाँ मेरे शब्कोष में उस समय थीं उन् सबकी सरहद के उस पार माया बहुत ऊँचे दर्जे की गालियों का उपयोग कर रही थी॥ और ये उस इंटरव्यू का हश्र था जोकि महिला सशक्तिकरण के विषय पर माया के विचार जानने के उद्देश्य से लिया जा रहा था॥ मतलब कि राजनीति या किसी विवाद में उलझाने का न तो मेरा विचार था और न ही मैंने ऐसा कोई सवाल माया से पूछा॥ पर माया कि जुबान कैंची की चाल और सांप के ज़हर दोनों को पछाड़ रही थी॥ मेरा सवाल चाहे माया की शिक्षा के बारे में हो या उसकी परवरिश, माता-पिता और नाते-रिश्तेदारों के बारे में मेरे हर सवाल कि चक्की में माया सिर्फ़ ब्राहमणों और मन्नू महाराज को ही पीसने पर आमादा थी॥ उस वक्त मुझे लगा की शायद मन्नू महाराज ने जलमगन हो रही पृथ्वी के जीवों को बचाने के लिए ईश्वर द्वारा भेजी गई नाव में माया को बैठाने से इनकार कर दिया होगा॥ वरना इतनी दुश्मनी तो १७ बार पृथ्वीराज चौहान से शिकस्त खाने वाले मोहम्मद गोरि ने भी पृथ्वी राज चौहान से नहीं की होगी और न ही अंग्रेजों का नाम सुन के सवतंत्रता सेनानियों का लहू इस कदर खौलता होगा जिस तरह माया की धमनियों में बहता लहू प्रलय मचाने पर उतारू था॥ बस गुस्से के मारे तांडव करना बाकि रह गया था॥

जैसे तैसे कर मैंने मन ही मन राम का नाम लेते हुए वो इंटरव्यू पुरा किया॥ और माया से चलने की इजाज़त मांगी॥ तब शायद मैडम को ख्याल आया कि इस इंटरव्यू के पब्लिश होने की तारीख जानने के लिए उन्हें मेरा नाम और टेलीफोन नंबर लिख्वाके रख लेना चाहिए॥ इसलिए मुझसे मेरा नाम एक बार फिर पूछा गया॥ पहली बार परिचय देते वक्त मैंने अपने नाम के साथ उपनाम यानि सर नेम का इस्तेमाल नही किया था वरना ये इंटरव्यू इतना मज़ेदार न रहता॥ मगर इस बार मैंने माया के सामने उसके दिमाग के आँगन में घुस कर बम्ब ब्लास्ट किया और अपना नाम अपने सर नेम के साथ बताया॥ जिसे सुन कर माया सन्न रह गई॥ उसकी समझ में आ चुका था की मैं एक ब्राह्मन परिवार से हूँ॥ और ऊपर से एक पत्रकार जिसने अभी अभी मायावाणी से प्रसारित कार्यक्रम "ब्राहमणों की ऐसी तैसी" का सीधा प्रसारण न सिर्फ़ सुना बल्कि देखा भी ॥ पत्रकार और ब्राह्मन ये कॉम्बिनेशन माया को हज़म नही हो रहा था क्योंकि उसके चेहरे की हवाइयां चारों तरफ़ उड़ान भरती साफ़ दिखाई दे रही थी॥

अचानक माया ने अपनी माया दिखाई ख़ुद को संभाला और न चाहते हुए भी अपनी कुर्सी को कुछ पल के छोड़ वो खड़ी हुईं और मुझे गले से लगाते हुए बोली बड़ा अच्छा लगा आपसे महिला सशक्तिकरण के मुद्दे पर बात करके॥ महिला समाज को आप जैसी जुझारू युवाओं की इस समय ज़रूरत है तभी महिलाओं का उद्दार होगा॥ और आप बिना चाय नाश्ता किए कैसे जा सकती हैं?? चलिए आपके बहाने मैं भी कुछ खा लुंगी॥ वरना समाज सेवा में कहाँ वक्त मिलता है कुछ खाने-पिने का..
अब माया ने अपनी जुबान के टेप रिकार्डर का टेप बदला और उसमें ब्राह्मन प्रेम के भजन बजाने शुरू किए॥ अरे मुझे पैदा ज़रूर एक दलित माँ ने किया है मगर मैं पली बड़ी एक ब्राह्मन परिवार में थी ॥ दिल्ली के इन्द्रपुरी इलाके में जहाँ हम रहते थे वहां हमारे ज्यादातर पड़ोसी ब्राह्मन ही थे॥ और सबसे अच्छे पड़ोसी जो की एक उच्च दर्जे के ब्राह्मन थे उन्ही के यहाँ मेरा ज़यादा वक्त गुज़रता था॥ ज़िन्दगी में पढ़ लिख कर कुछ बनने के लिए उस ब्राह्मन परिवार ने ही मुझे प्रेरित किया॥ और ऐसे ही न जाने कितने और ब्राहमण प्रेम के किस्से मैंने माया की उसी ज़ुबान से सुने जो कुछ क्षण पहले ब्राहमणों को इस धरती का बोझ, कलंक जैसे शब्दों का हार पहना चुकी थी॥
जो भी हो माया ने अपने नाम को सार्थक कर दिखाया और मैं ये सोच रही थी की हमने अपने देश और समाज के कर्णधारों का नाम पहले लीडर रखा फ़िर राजनेता, अब सिर्फ़ नेता के नाम से उन्हें संबोधित करते हैं पर अब उन्हें एक नए नाम की ज़रूरत है "गिरगिट"॥

शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2009

राज ठाकरे जी, ये क्या हो रहा है??

जब से राज ठाकरे ने "मराठा वाद" का राग छेड़ा है तब से मैं मुंबई में चलने वाली हवाओं में एक अजीब सा परिवर्तन देख रही हूँ। चुनावों में राज ठाकरे की पार्टी का जिस तरह सुपडा साफ हुआ वो तो खैर होना ही था लेकिन उसके पहले ही टेलिविज़न जगत ने जैसे कसम खा ली थी की अब सारे उत्तर-पूर्वी भारत को मुंबई में ला बसाना है। नतीजतन एकाएक बिहारी, पंजाबी, गुजरती, हरयाणवी, बंगाली कहानियों का एक हजूम सा टेलीविजन धारावाहिकों में उमड़ पड़ा है। और इस नई परम्परा के चलते उत्तर-पूर्वी भाषाओँ में पकड़ रखने वाले कलाकारों को मानो दूरबीन के द्वारा ढूँढा जा रहा है। बच्चों से लेकर बूढों तक के किरदार के लिए कहीं बिहारी तो कहीं हरयाणवी, पंजाबी, गुजराती कलाकारों की चाँदी हो रही है। हर एक चनैल अपने-अपने प्राइम टाइम को और ज़यादा कमाऊ पूत बनाने के लिए उत्तर-पूर्वी भारत के परिदृश्य पर आधारित कहानियों, किरदारों और भाषा का तड़का लगाने में व्यस्त है। कलर्स टीवी पर जहाँ एक और "बालिका वधु" राजस्थान की सुनहरी रेत पर अपनी सफलता का इतिहास रच रही है वहीं "न आना इस देस लाडो" में सभी कलाकार हरयाणवी तेवरों से दर्शकों का मन मोह रहे हैं। एनडी टीवी पर "बंदिनी" ने गुजरात से अपना रिश्ता जोड़ लिया है तो ज़ी टीवी का बहु चर्चित धारावाहिक "छोटी बहु" में बनारस के घाट अपनी लोकप्रियता के परचम लहलहा रहे हैं। "अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो" की बिटिया ने राज ठाकरे के कट्टर दुश्मन बिहार की चुनरी ओढ़ के दर्शकों के दिलों में अपनी जगह बना ली है। यानि कुल मिला के जो चमत्कार टेलिविज़न के इतिहास में आज तक नही हुआ वो इत्तेफाकन अब हो रहा है। जी हाँ ये सब महज़ एक इतेफाक ही है मगर दिलचस्प इतेफाक कि जैसे ही राज ठाकरे ने "मराठा वाद" कि भट्ठी सुलगा के अपने राजनितिक कैरिअर कि रोटियां सकने का बंदोबस्त किया वैसे ही टेलीविजन पर "अनेकता में भी एकता की मिसाल" भारतीय संस्कृति का देस राग गूंजने लगा। जिसका हर एक सुर इतना सधा हुआ है कि आने वाले कई वर्षों तक ऐसे-ऐसे एक सहस्त्र राज ठाकरे मिल कर भी नाखून को मांस से अलग नही कर सकेंगे। जिन छोटी छोटी रियासतों को जोड़ कर अखंड भारत की नीव रखने वाले सरदार वल्लभ भाई पटेल ने "आयरन मैन" यानि लोह पुरूष का खिताब जीता था उस अखंड भारत की नीव को हिलाना किसी राज ठाकरे जैसे कलयुगी "जयचंद" के बस कि बात नहीं। इसलिए हर एक नेता को अभी से ये सबक ले लेना चाहिए कि भारतीय लोकतंत्र का मखोल उड़ने के दिन अब लद गए हैं। जनता का दिल जितने की एक ही "मास्टर की" है और वो है निस्वार्थ समाज सेवा। तो जो जो "नेता गण" भारत भाग्य विधाता बनने का सपना पाल रहे हैं वो अभी से निस्वार्थ सेवा का रास्ता अपना लें तो अगले चुनाव में उनकी जीत का विश्वास मैं उनको दिलाती हूँ।
राज ठाकरे की पूर्व कारिस्तानियों से सम्बंधित एक और लेख पड़ने के लिए यहाँ दिए गए लिंक पर जायें:

http://kashmir-timemachine.blogspot.com/2009/01/w-hen-i-was-thinking-of-going-to-bed.html

शनिवार, 25 जुलाई 2009

सत्तर के उस पार क्या है??

कुछ लोग होते हैं जो दूसरों की मिसाल या उदाहरण दे कर ज़िन्दगी जीते हैं और कुछ लोग वो होते हैं जो जीते जी औरों के लिए एक मिसाल बन जाते हैं। ज़िन्दगी के हर मोड़ पार कुछ न कुछ नया, प्रगतिशील और जीवंत उदाहरण बनने का मनो इन लोगों में एक जूनून सा होता है। इन् लोगों पर उम्र कभी हावी नहीं होती बल्कि ये लोग हर हाल में अपनी उम्र पर हावी हो के ये सोचने पर मजबूर कर देते हैं की क्या सचमुच ये लोग ७० का आंकडा पार कर चुके हैं??
बात की शुरुआत करते हैं पहली बार ऑस्कर पुरस्कार समिति को एक हिन्दी गीत गुनगुनाने और समझने पार मजबूर करने वाले सम्पूरण सिंह कालरा यानी हम सब के अपने "गुलज़ार साहब" से। करीब तीन साल पहले उम्र की ७०वीं देहलीज़ पार कर चुके गुलज़ार साहब जैसे अब आदी हो चुके हैं अपने गीतों से हर साल एक नया इतिहास रचने की। कहानी, संवाद लेखन से लेकर गीत रचना, फ़िल्म निर्माण-निर्देशन, मानों हर जगह गुलज़ार साहब अपना नाम देखने आदत पड़ गई है। पुरस्कारों के मामले में भी इनकी अभिलाशों के बाल अभी भी पके नहीं हैं। गौरतलब है की अपनी कलम को अपनी पहचान बनाने से पहले गुलज़ार साहब एक कार गैरेज में काम करते थे। इनकी कभी न ख़तम होने वाली पारी और कितनी बार दुनिया को इनकी जय बुलाने पर मजबूर करेगी ये कहना मुश्किल है।
आगे बात करते हैं मंगेशकर बहनों की। सत्तर बसंत इन्होने बस यूँ हीं गाते-गुनगुनाते, हम सब का दिल बहलाते कब और कैसे बिता दिए ये किसी को भी पता नहीं चला। विविध भाषाओं वाले देश भारत की किस-किस भाषा के गीतों को इन्होने अपनी जादुई आवाज़ से सजाया है ये कहने से बेहतर होगा ये तलाशा जाए कि कौन सी भाषा में इन् दोनों बहनों संगीत कि साधना नहीं की ? फिल्मफेर, राष्ट्रिय पुरस्कार, दादा साहब फाल्के पुरस्कार इनके लिए मानों हर साल उगने वाली फसलों की तरह हैं। पुरस्कारों कि भीड़ का सामना करते-करते ये बहने भले ही थक चुकी हों लेकिन इनके चाहनेवाले इनकी आवाज़ के जादू से अभी थके नहीं हैं।
ज़िन्दगी में ७० दशकों के बाद एक नई जवानी की बुनियाद रखने वालों में फ़िल्म जगत ही अग्रणीय है ऐसा नहीं है। चौदवी और पन्द्रहवीं लोक सभा में कांग्रेस के सर पर जीत का सेहरा बांधने वाले और पूरे देश को "सिंग इस किंग" का नारा देने वाले प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की उपलब्धियों की सूची इनकी उम्र में दर्ज सालों से भी बड़ी हो चुकी है। और वहीँ ७० जमा १० अस्सी के आंकडे को भी छू चुके श्री लाल कृष्ण आडवानी ने तो अपनी जोश और नेतृत्व से अपने से आधी उम्र के राहुल गाँधी तक को अपनी लोकप्रियता और सूझ-बुझ के प्रति आशंकित कर दिया था। देव आनंद, मकबूल फ़िदा हुसैन, जोहरा सहगल, भीम सेन जोशी, दारा सिंह, यश चोपडा ये वो नाम हैं जो आज की युवा पीढी को ये सोचने पर मजबूर करते देते हैं कि क्या इनसे दुगने जोश और सकारात्मक परिस्थितियों के बावजूद वो लोग इनके हौसलों को कहीं रत्ती भर भी छू सके हैं। आखिर इन हरफनमौला, ७०+नौजवानों की ढलती उम्र में चढ़ते जादू का राज़ जानने की क्या कभी हमारे युवा कोशिश करेंगे??

शुक्रवार, 19 जून 2009

शोपियां, उमर अब्दुल्लाह और काश्मीर..

शोपियां और उमर अब्दुल्लाह के बारे में बहुत कुछ कहा सुना गया है। हालाँकि लिखने या कहने से भुक्तभोगी का दर्द कम नहीं किया जा सकता फिर भी सच का सामना करना ज़रूरी है। सच क्या है ? क्या ये सच है जो लेखक ने ख़ुद कश्मीर के हर गली नुक्कड़ में जा कर खोजने की कोशिश की?? नीचे दिए लिंक पर कश्मीर के वर्तमान हालत का खुलासा किया गया है कितना सही है और कितना ग़लत इसका फ़ैसला दिल से नहीं दिमाग से करना होगा..
http://kashmir-timemachine.blogspot.com/search/label/omar%3B%20shopian

शनिवार, 11 अप्रैल 2009

जनता "राग" नेताओं केलिए..

चुनावी मौसम् में हर पार्टी अपनी पसंद का गीत संगीत रच कर जनता के कान, आँख, दिल सब को मोह लेना चाहती है॥ अब हमारे नेताओं में इतनी सृजनात्मकता यानि क्रिएटीवीटि भरी है तो जनता का भी कुछ फ़र्ज़ बनता है की उन्ही के अंदाज़ में उन तक अपनी बात पहुँचाने का बंदोबस्त किया जाए॥ ये काम करने के लिए वर्षों पहले दो गीतकारों ने अपनी दूरदर्शी समझ का इस्तेमाल किया और दो ऐसे अमर गीत रच डाले जिन्हें हर चुनावी मौसम में घर घर में बजाना चाहिए॥ जूते चप्पलें तो खैर अब मुंबई की बेमौसम बरसात की तरह यहाँ-वहां से बरस ही रहे हैं लेकिन अगर ये दो गीत हर नेता के आगमन पर बजाने शुरू कर दिए जायें तो शायद हाथी से भी मोटी चमड़ी वाले इन बगुला भगतों की अक्ल में कुछ सुधार होने लगे॥
देखिये उम्मीद पे दुनिया कायम है॥ तो ये पहला गीत है फ़िल्म "नवरंग" जिसके रचेयता थे "श्री भरत व्यास" और दूसरा गीत है फ़िल्म "रोटी कपड़ा और मकान" से इस गीत के चमत्कारिक बोल रचे थे "वर्मा मल्लिक" ने॥ और इतिहास गवाह है की इस गीत ने उस वक्त की मौजूदा सरकार की नींद उदा दी थी॥


फ़िल्म : नवरंग
गीतकार : भरत व्यास

कविराजा कविता के मत अब कान मरोड़ो, धन्धे की कुछ बात करो कुछ पैसे जोड़ो
शेर शायरी कविराजा न काम आयेगी, कविता की पोथी को दीमक खा जायेगी
भाव चढ़ रहे, अनाज हो रहा महंगा, दिन दिन भूखे मरोगे रात कटेगी तारे गिन गिन
इसीलिये कहता हूँ भैय्या ये सब छोडो, धन्धे की कुछ बात करो कुछ पैसे जोड़ो............
अरे छोड़ो कलम, चलाओ मत कविता की चाकी, घर की रोकड़ देखो कितने पैसे बाकी
अरे कितना घर में घी है, कितना गरम मसाला, कितना पापड़, बड़ि, मंगोरी मिर्च मसाला
कितना तेल लूण, मिर्ची, हल्दी और धनिया, कविराजा चुपके से तुम बन जाओ बनिया
अरे पैसे पर रच काव्य, अरे पैसे, अरे पैसे पर रच काव्य, भूख पर गीत बनाओ,
गेहूँ पर हो ग़ज़ल, धान के शेर सुनाओ
लौण-मिर्च पर चौपाई, चावल पर दोहे, सुगल कोयले पर कविता लिखो तो सोहे
कम भाड़े की, अरे कम भाड़े की खोली पर लिखो क़व्वाली, झन झन करती कहो रुबाई पैसे वाली
शब्दों का जंजाल बड़ा लफ़ड़ा होता है, कवि सम्मेलन दोस्त बड़ा झगड़ा होता है
मुशायरों के शेरों पर रगड़ा होता है, पैसे वाला शेर बड़ा तगड़ा होता है
इसीलिये कहता हूँ मत इस से सर फोड़ो, धन्धे की कुछ बात करो कुछ पैसे जोड़ो......

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फ़िल्म : रोटी कपडा और मकान

गीतकार : वर्मा मल्लिक

उसने कहा तू कौन है, मैंने कहा उल्फ़त तेरी, उसने कहा तकता है क्या, मैंने कहा सूरत तेरी
उसने कहा चाहता है क्या, मैंने कहा चाहत तेरी, मैंने कहा समझा नहीं, उसने कहा क़िस्मत तेरी
एक हमें आँख की लड़ाई मार गई, दूसरी तो यार की जुदाई मार गई तीसरी हमेशा की तन्हाई मार गई,
चौथी ये खुदा की खुदाई मार गई, बाकी कुछ बचा तो मंहगाई मार गई, मंहगाई मार गई...
तबीयत ठीक थी और दिल भी बेक़रार ना था, ये तब की बात है जब किसी से प्यार ना था
जब से प्रीत सपनों में समाई मार गई, मन के मीठे दर्द की गहराई मार गई
नैनों से नैनों की सगाई मार गई, सोच सोच में जो सोच आई मार गई
बाकी कुछ बचा तो मंहगाई मार गई, मंहगाई मार गई........

कैसे वक़्त में आ के दिल को दिल की लगी बीमारी, मंहगाई की दौर में हो गई मंहगी यार की यारी
दिल की लगी दिल को जब लगाई मार गई, दिल ने की जो प्यार तो दुहाई मार गई
दिल की बात दुनिया को बताई मार गई, दिल की बात दिल में जो छुपाई मार गई,
बाकी कुछ बचा तो मंहगाई मार गई, मंहगाई मार गई..........
पहले मुट्ठी विच पैसे लेकर, पहले मुट्ठी में पैसे लेकर थैला भर शक्कर लाते थे
अब थैले में पैसे जाते हैं मुट्ठी में शक्कर आती है
हाय मंहगाई, मंहगाई, मंहगाई .... दुहाई है, दुहाई है, दुहाई है, दुहाई... मंहगाई मंहगाई मंहगाई मंहगाई
तू कहाँ से आई, तुझे क्यों मौत ना आई, हाय मंहगाई मंहगाई मंहगाई
शक्कर में ये आटे की मिलाई मार गई, पौडर वाले दुद्ध दी मलाई मार गई
राशन वाली लैन दी लम्बाई मार गई, जनता जो चीखी चिल्लाई मार गई, बाकी कुछ बचा तो मंहगाई मार गई, मंहगाई मार गई...
गरीब को तो बच्चों की पढ़ाई मार गई, बेटी की शादी और सगाई मार गई
किसी को तो रोटी की कमाई मार गई, कपड़े की किसी को सिलाई मार गई
किसी को मकान की बनवाई मार गई,

जीवन दे बस तिन्न निशान - "रोटी कपड़ा और मकान"..........

मंगलवार, 7 अप्रैल 2009

प्रजातंत्र, चुनाव और जूता..

सुना है की कल असम में कोई बम्ब ब्लास्ट वगैरह हुआ था॥ और कोई ८-९ लोग मारे भी गए थे॥ टीवी तो मैंने कल भी देखा था मगर शायद मीडिया उस ख़बर से ज़यादा प्रभावित नही हुआ इसलिए मीडिया की भट्टी असम ब्लास्ट के अंगारे ज़्यादा गरम नही हुए॥ ये भी मुझे आज पता चला॥ अपने के पी एस गिल साहब से द्वारा॥ अभी अभी जब वो आज की सबसे बड़ी ब्रेकिंग न्यूज़ "गृह मंत्री पर चला जूता" के बारे में अपनी निष्पक्ष राय टीवी पत्रकारों को दे रहे थे॥ तब उन्होंने इस जूतागिरी के नए फैशन की निंदा की और साथ ही एक अहम् सवाल उठाया की इस जूतेके पीछे पूरा मीडिया समाज क्यों जुटा हुआ है॥ इतनी हलचल मीडिया में कल क्यों नही हुई जब असम में बम्ब ब्लास्ट हुआ?? कई लोग ज़ख्मी हुए और मारे भी गए??
सच में अगर यह कल की घटित घटना है भी तो इस दुर्घटना से ज़्यादा कल आम दिनों की तरह ही हर टीवी चैनल आने वाले चुनावों के प्रति ही समर्पित दिखाई दिया॥ अरे हाँ कुछ एक चैनल तो राजनेताओं की तिजोरियों का लेखा-जोखा दर्शकों के सामने पेश कर समझ रहे थे कि लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहलाने का उनका उत्तरदायित्व पूरा हुआ॥ इतना कर देने से जनजागृति की मशाल जल उठेगी और आने वाले चुनावों में कोई चमत्कार होगा॥ और शायद दूर किसी अन्य लोक से कोई नई सरकार ज़मीं पर उतर आएगी॥ जो बोट द्वारा मुंबई में घुसपैठ कर आतंक का नंगा नाच खेलने वालों और पड़ोसी देश में बैठे उनके आकाओं के खिलाफ आखरी और निर्णायक कदम उठाएगी॥
क्या हर बार नेताओं की जमा पूंजी का ब्यौरा जनता को देने से और "एक्जिट पोल" पर आधारित कुछ एक समय गवाओं कार्यक्रम प्रसारित करने से हमारा लोकतंत्र को एक सही दिशा और सरकार मिल जायेगी??
क्या मीडिया का ये फ़र्ज़ नही के वो चुनाव से पहले हर नेता की "टेरीटरी" में जायें और वहां की जनता से पूछे कि क्या पाँच साल पहले उनसे किए गए वादे पुरे हुए हैं?? पिछले पाँच सालों में इलाके के नेता ने कितनी बार अपना चेहरा जनता को दिखाया है?? किस नेता के इलाके में उन्नति हुई और कहाँ की जनता के दामन में आज भी सिवाए आक्रोश के और कुछ नही है?? संसद में किस नेता की हाज़री कितनी रही??
क्या फरक पड़ता है सरकार चाहे भाजपा की हो या कांग्रेस की?? देश में भिखारिओं का बिसिनेस और उनकी संख्या बढाती रहेगी, सरकारी स्कूलों के नाम पे चलने वाली बिना पहिये की बैलगाडी की हालत बद से बदतर होती रहेगी, अल्प संख्यकों के नाम पर होने वाली राजनीति में दो चार नए मुद्दे जुड़ते रहेंगे, पेट्रोल का दाम बढ़ता रहेगा और रुपये की कीमत डॉलर के मुकाबले कम होती रहेगी, आतंकवाद और कश्मीर के मुद्दे तो हर सरकार की पाली हुई रखैल पहले भी थे तब भी रहेंगे॥ इसके बिना किसी भी राजनितिक दल का न तो पकिस्तान में गुज़ारा है ना ही भारत में॥ क़र्ज़ और महंगाई के मारे किसान खुदकुशी करते रहेंगे॥ ८४ के दंगो में ६००० से ज़्यादा नरसंहार करवाने वालों को २४ साल बाद चुनाव से ठीक पहले क्लीन चिट मिलती रहेगी और "जरनैल सिंह" जैसे पत्रकार ख़ुद अपने ही समाज का देश की सरकार के हाथों चिर हरण होता देख एक-आधा जूता किसी गृह मंत्री पे फेंके अपनी बेबसी का इज़हार करते रहेंगे और हम ब्लॉग लिखने वाले अपने कंप्यूटर बैठ कर अपने दिल और दिमाग में उठते तूफान को ऐसे ही किसी पोस्ट में लिख कर फिर अगले विषय के बारे में सोचते रहेंगे॥ और प्रजातंत्र चुनाव और जूतों का खेल यु ही चलता रहेगा॥




Picture Courtesy: http://www.allvoices.com

शनिवार, 28 मार्च 2009

सफलता का मूल मंत्र : मेहनत या विवाद??

राखी सावंत, संभावना सेठ, राहुल महाजन, मोनिका बेदी, अर्जुन सिंह, ऐ.आर.अन्तुले और अब वरुण गांधी ये उन् लोगों के नाम हैं जिन्होंने नई पीढ़ी को एक ऐसी दिशा दिखाई है जिस पर चल के सिर्फ़ और सिर्फ़ अपना फायदा हो सकता है समाज का नही॥ हालाँकि ये सभी लोग यदा-कदा समाज के ठेकेदार होने का स्वांग रचते रहते हैं मगर जो इन्सान कौए की तरह अपनी पूंछ में मोर का पंख लगाके अपनी चाल और रुतबा बदले मेरी नज़र में वो इंसान विश्वास के लायक हो ही नहीं सकता॥ इन् लोगों ने अपने बड़बोलेपन, बददिमाग तेवरों, विवादित और स्वार्थ से लबरेज़ टिपण्णयों के एस्केलेटर का इस्तेमाल करके रातों-रात सुर्खियों में आने का खोखला मंत्र जनता को दे दिया है॥

हर दुसरे-तीसरे रियलिटी शो में जज या बतोर मेहमान कलाकार आ कर लाखों रुपये बटोरने वाली राखी सावंत को हम में से कितने लोग मिक्का-राखी "किस" विवाद से पहले जानते थे?? यही नही इन मोहतरमा के खुले मुह ने ना सिर्फ़ अपनी अगली ७ पुश्तों की रोज़ी-रोटी का बंदोबस्त कर लिया है बल्कि अपने तथाकथित पूर्व बॉय-फ्रेंड अभिषेक अवस्थी का भी जन्म सफल कर दिया है॥ जोकि आजकल एक हास्य धारावाहिक में अभिनय पतंग की कन्नी काटते दिखाई देते हैं॥ बिग-बॉस सीज़न-२ से पहले भोजपुरी फिल्मों की आइटम गर्ल संभावना सेठ का नाम शायद उसकी बिल्डिंग में रहने वाले लोगों ने भी नही सुना होगा मगर आज उसे हिंदुस्तान के गली-नुक्क्ड में हर कोई पहचानता है?? मगर ये ओछी सफलता की सीढ़ी उसे बिग बॉस के घर में रहने के कारण नही बल्कि अपने बदतमीजी भरे लहजे, साथी सदस्यों पर बेहूदा टिपण्णयों और बेलगाम जुबान के चलते हासिल हुयी थी॥ वरना उसी शो में केतकी दवे पुरी फौज की रसोई बनाते और उन्हें अपने मातृत्व भरी भावनाओ से सराबोर कर-कर के थक गई और आज वो कहीं नही॥ संजय निरुपम, जुल्फी, डाइना हेडेन, एहसान कुरैशी आदि नामों की फेरहिस्त लम्बी है जिन्होंने अपनी छवि और समाज के प्रति एक सफल और प्रसिद्द व्यक्ति की जिम्मेदारियों को समझते हुए मर्यादा के दायरे में रहते हुए दर्शकों का मनोरंजन किया और खेल को खेला॥ मगर सफल होने के लिए विवादों के पायदान पर कभी पाँव नही रखा॥

अब बात करते हैं कभी छोटे और कभी बड़े हस्गुल्लों से अपना मन बहलाने वाले राहुल महाजन की॥ उनको बिग-बॉस में प्रवेश क्यों दिया गया ये बात जगजाहिर है॥ ड्रग्स काण्ड और इनकी विवाहित ज़िन्दगी के विवादों को मीडिया ने इस कदर हवा दी की राहुल की पो बारह हो गई और एक के बाद एक नौकरी व् बिज़नस में असफल राहुल आज न सिर्फ़ ख़ुद सफलता के गुम्बद्दको थामे हुए हैं बल्कि एक रियलिटी शो के द्वारा नई हास्य प्रतिभाओं को परखने की ज़िम्मेदारी का बोझ भी अपने कमज़ोर कन्धों पर उठा रहे हैं॥ जबकि हास्य या स्टैंडअप्प कॉमेडी से उनका कोई रिश्ता नही है॥ उस लिहाज़ से बतौर जज एहसान कुरैशी का दावा राहुल महाजन से कहीं ज़्यादा पुख्ता है॥ मगर एहसान के पास विवादित छवि नही इस्सलिये उनको पूछने वाला कोई नही..

अब मोनिका बेदी का ज़िक्र करें तो आप-हम सभी जानते हैं की अगर मोनिका पर अबू सलेम की नज़रें इनायत ना होती तो ये कुवारी/विवाहित/तलाकशुदा कन्या (जो भी टाइटल इन्हे पसंद हो ये चुन सकती हैं) का बोरिया बिस्तर अभिनय जगत से कब का बंध चुका था॥ मगर आज ये एक के बाद एक रियलिटी शो में ठुमके लगा रही हैं और एक सफल और जाना पहचाना चेहरा होने का भरपूर आनंद ले रही हैं॥

सफलता के इस महामंत्र के प्रचारकों में अभिनेता ही नही नेता भी काफी बाज़ी मार रहे हैं॥ मुंबई धमाके के शहीदों पर उंगली उठा के समाचार जगत का ध्यान उन धमाकों से हटा के अपनी और खींचने वाले ऐ.आर अंतुले को शायद उनके पड़ोसी या मौजूदा सरकार के कुछ एक गिने-चुने लोग ही जानते होंगे मगर अंतुले ने "अपनी उंगली टेढी कर सफलता का ऐसा घी निकला" की बिना कुछ किए वो अपने समाज के मसीहा के रूप में पूजे जाने लगे॥ विवादित चेहरों का ज़िक्र हो अर्जुन सिंह पीछे रह जायें तो ये उनके साथ अन्याय होगा॥ दूसरी दुनिया से बुलावे का इंतज़ार कर रहे अर्जुन सिंह जब भी अपना नाम सुर्खियों में देखने को बेताब होते हैं बस आरक्षण के ज़हर में डूबा एक तीर युवाओं के दिल में उतार देते हैं॥ नतीजा वील चेयर पर बैठे इस अपाहिज नेता की कुर्सी पर आज भी दीमक नही लगा॥ अस्पताल के चक्कर काटते हुए भी अपने आस-पास जर्नलिस्टों का हुजूम कैसे एकत्रित करना है ये राज़ इनसे बेहतर शायद ही किसी को पता हो॥

और अब आखिर में बात करते हैं गाँधी खानदान के सबसे छोटे चिराग यानि वरुण गाँधी की॥ वरुण के विवादित भाषणों ने शर शैय्या पर पड़ी भारतीय जनता पार्टीको जैसे संजीवनी बूटी सुंघा दी है॥ रातों रात हासिल हुयी इस सफलता ने राहुल गाँधी के प्रधानमंत्री बनने के सपने के रंग ज़रूर कुछ फीके कर दिए होंगे॥ बेचारे राहुल गाँधी जोकि आम आदमी का दिल और वोट जितने केलिए कभी मजदूरों के साथ मिटटी ढोहते दिखाई देते हैं तो कभी कोई और झुनझुना पकडे आम आदमी को अपना हाथ पकडाने की पुरजोर कोशिश करते नजर आते हैं॥ पर सफलता है की एक बेवफा माशूका की तरह बड़े भाई का हाथ छोड़ छोटे भाई का दामन थामती दिखाई दे रही है॥

जो भी हो मेरी आम जनता और खास तौर पे देश के युवाओं से येही गुजारिश है की बजुर्गों कीबनाई कहावत "मेहनत ही सफलता की कुंजी है" इस पर अमल करना न छोडें॥ वरना देश में हर घर में एक संभावना अपने भाई-पिता या माँ को मुह तोड़ जवाब देती नजर आएगी, हर घर में एक राहुल महाजन अपनी पत्नी को पिटता दिखाई देगा, हर गली चोराहे पे एक राखी सावंत जिस्म की नुमाइश करती दिखाई देगी॥ शादी के इश्तिहार में एक अदद अंडर वर्ल्ड से जुड़े पति की फरमाइश की जायेगी॥ हर नेता अन्तुले के नक्शे क़दमों पे चल के शहीदों की चिता पर राजनीती की रोटियां सकेगा और चुनावों में हर पार्टी धर्म के नाम पर जनता को उनकी हिफाज़त के सब्ज़ बाग़दिखाती नजर आयेगी॥ क्यायही है आपके सपनो का भारत??