मीडिया लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
मीडिया लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 25 जनवरी 2014

नाम में क्या रखा है??

फ़िल्म और टेलीविजन की दुनिया में कुछ नियम ऐसे हैं जो वर्षौ से निभाए जा रहे हैं और आने वाली कई सदियों तक बिना किसी फेर बदल के निभाए जाते रहेंगे। पत्थर पर खिंची लकीर की तरह इन नियमों में एक अहम् नियम है किसी फ़िल्म या धारावाहिक के किरदारों का सरनेम यानि उपनाम रखना। किसी भी फ़िल्म अथवा धारावाहिक में तीन तरह के किरदार होते हैं। एक वो जो ईमानदार, भावुक, सहनशील और त्याग की प्रतिमूर्ति होते हैं। इस तरह के किरदारों के उपनाम में शर्मा, माथुर, गुप्ता, उपाध्याय, दिक्षित जैसे उपनामों को प्रमुखता दी जाती है। पता नही क्यों कहानीकारों यानि लेखकों को इन् उपनामों में बेचारगी, आंसुओं और आत्मसम्मान का मिक्सचर दिखाई देता है?? हालाँकि असल ज़िन्दगी में इन बिरादरियों में भी अच्छे बुरे सभी तरह के लोग पाए जाते हैं। पर मनोरंजन जगत ने कब, कैसे और क्यों इन जातियों का सम्बन्ध सीधे-साधे, त्यागशील या न्याय के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले लोगों के साथ जोड़ दिया इसका कोई उत्तर मुझे आज तक समझ नहीं आया। चांदनी फ़िल्म में श्री देवी का नाम चाँदनी माथुर, कुछ कुछ होता है में काजोल बतौर अंजलि शर्मा, खाकी का डी सी पी अनंत श्रीवास्तव टेलीविजन धारावाहिक में कितनी मुहोब्बत है की मुख्य किरदार आरोही शर्मा-ये कुछ ऐसे उदाहरण हैं जो इस वक्त मेरे मस्तिष्क के दरवाज़े पर दस्तखत दे रहे हैं।
फ़िल्म और धारावाहिकों की दुनिया में दूसरी किस्म के लोगों में वो किरदार आते हैं जो रईस, रोबदार या फिर खलनायक का चोला पहन के अवतरित होते हैं। इन किरदारों को खरबंदा, वाधवा, चौहान, अग्रवाल, ओबराय, खुराना, खन्ना, वीरानी, चौधरी जैसे वज़नदार उपनामों का धुरी पर घुमाया जाता है। क्योंकि उस किरदार को हमेशा अपने खानदान की इज्ज़त, रुतबे का ऐलान करना होता है ऐसे में वीरानी खानदान, चौधरी परिवार, वधवा फॅमिली आदि शब्दों का प्रयोग कहानी के पात्र की ऊँची आन-बान और शान को अनायास ही स्थापित करने में सहायता करते हैं। फिल्म कुछ कुछ होता है में राहुल खन्ना, चाँदनी का रोहित अग्रवाल, अग्निपथ का विजय दिना नाथ चौहान, बाबुल में बलराज कपूर, और टेलीविजन धारावाहिकों के पूर्वज क्योंकि सास भी कभी बहु थी का वीरानी परिवार, कुमकुम का वाधवा खानदान, कहानी घर घर की का अग्रवाल परिवार और नई फसल में बंदनी का माहियावंशी परिवार आदि वो उदाहरण हैं जो छोटे-बड़े परदे की कहानी के तयशुदा नियमों पर खरे उतरते हैं।
आख़िर में बात करते हैं छोटे-बड़े परदे के मसखरों यानि हंसने-हँसाने वाले किरदारों की। तो इनके लिए ज्यादातर उपनामों के झमेले में पड़ने की बजाये इनके सिर्फ़ नाम पर ही ध्यान दिया फिर भी। फूल एंड फाइनल का किट्टू पाइलेट, हम आपके हैं कौन में लल्लू, आवारा पागल दीवाना का छोटा छतरी। फिर भी अगर कभी इन्हे उपनामों से नवाजना पड़े तो ज्यादातर दारूवाला, पोपट, चिटनिस, गंसोल्वेस, खोटे, गोडबोले, पिल्लै, सिद्धू, सिंह, यादव, पांडुरंग, आदि उपनामों की लक्ष्मण रेखा के भीतर ही हर लेखक के दिमाग का घोड़ा चक्कर काटता दिखाई देता है।
इस बे-सर पैर के नियम का पालन क्यों किया जाता है पता नहीं। मगर हैरानी की बात ये है की कहानी, किरदार और घटनाओं में नवीनता खोजने वाले लेखकों का खोजी दिमाग कभी भी इस नियम के विरूद्ध जाने का खतरा मोल नहीं लेता।
बहरहाल असल ज़िन्दगी में कोई भी धर्म, जाति या बिरादरी ऐसे किसी नियम से बंधी हुई नही है क्योंकि अगर ऐसा कोई नियम होता तो ऋषि पुलस्त्य के यहाँ राक्षस बुद्धि रावन का जन्म नहीं होता है और राक्षस राज हिरणाकश्यप के यहाँ श्री हरि के परम भकत प्रह्लाद अवतरित न हुए होते।

शुक्रवार, 11 अक्टूबर 2013

फ़िल्म इंडस्ट्री, प्रोफ़ेशनलिज़्म और आशुतोष गोवारिकर..

फ़िल्म इंडस्ट्री में ख़ुद को "प्रोफ़ेशनलिज़्म" के इकलौते जन्मदाता माननेवाले लोगों की कमी नही है॥ इन लोगो को अपने किसी खास रवैये की वजह से यह ग़लतफ़हमी होती है या यूँही "ज़रा हटके" जुमले का इस्तेमाल करने को लालायित ये लोग अपनेआप ही अपने माथे पर "प्रोफ़ेशनलिज़्म" की पट्टी बाँध लेते हैं, ये बात आजतक मुझे समझ नही आई॥
बातों के व्यूह जाल में न फंसते हुए असली घटना की चर्चा करते हैं॥ बात तबकी है जब मैं बीबीसी केलिए एक कार्यक्रम बना रही थी॥ कार्यक्रम का नाम था "बॉलीवुड इंक", यह प्रोग्राम हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्री के इतिहास, वर्तमान और उसके व्यावसायिक पहलुओं पर रोशनी डालता था। इंडस्ट्री के अलग-अलग डिपार्ट्मेंट्स जैसे फ़िल्म निर्माण, निर्देशन, फ़ाइनान्स, सैट डिसाइनिंग, कास्टयुम डिसाइनिंग आदि में आए बदलाव पर भी हम इस कार्यक्रम में बात करते थे॥ फ़िल्म इंडस्ट्री से जुडा कोई कार्यक्रम हो तो ज़ाहिर सी बात है की फ़िल्म निर्माता, निर्देशक और कलाकारों से मुलाकात और उनके दृष्टिकोण से दर्शकों को रु-ब-रु करवाना कार्यक्रम का एक अहम् हिस्सा होता है॥
आगे बढ़ने से पहले एक बात ख़ास तौर पर में कहना चाहूंगी कि "बॉलीवुड" इस नाम का इस्तेमाल करने से इंडस्ट्री में कई लोगों को परहेज़ है॥ और मैं ख़ुद उसी वर्ग विशेष का ही हिस्सा हूँ॥ जिन्हें लगता है कि हर चीज़ मे अंग्रेजों की नक़ल या उनकी सोच कि गुलामी अच्छी नही॥ "हॉलीवुड की तर्ज़ पर" अपनी इंडस्ट्री का नाम "बॉलीवुड" रखना हम लोगों को शर्मनाक लगता है॥ इस मामले में अमिताभ बच्चन सबसे आगे हैं, बच्चन साहब कभी भी "बॉलीवुड" शब्द का इस्तेमाल नही करते और ना ही ऐसी किसी किताब, कार्यक्रम या प्रोजेक्ट में इंटरव्यू देते हैं जहाँ हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्री को बॉलीवुड कह कर संबोधित किया जाए॥
खैर वो बच्चन साहब हैं कुछ भी करने या न करने का निर्णय ले सकते हैं॥ मगर हम लोग कई दफा न चाहते हुए भी हालत या "प्रोफ़ेशनलिज़्म" की चक्की में पिस जाते हैं॥ जिसका सबसे जीवंत उदाहरण है की मैं ख़ुद "बॉलीवुड" नाम के इस्तेमाल से परहेज़ करती हूँ मगर मैं इस कार्यक्रम का एक अहम् हिस्सा थी॥
इस कार्यक्रम के दौरान कई नामी-गिरामी फिल्मी हस्तियों से मिलने और उनके विचार जानने का मौका मुझे मिला॥ फ़िल्म निर्माण के विभिन्न पहलुओं के बारे में कई बारीकियाँ भी जानने और समझने को मिली॥
मगर इस सब के दौरान एक ऐसी घटना घटित हुयी जिसने इस चमकते आसमान के पीछे के अंधेरे से एक बार फ़िर मेरा परिचय करवाया॥ फ़िल्म निर्देशन के क्षेत्र में आए बदलाव के बारे में किसी सफल और मशहूर निर्देशक का इंटरव्यू मुझे करना था॥ गोवारिकर साहब को मैंने फ़ोन पर अपने कार्यक्रम के बारे में बताया और उनसे इंटरव्यू का टाइम निर्धारित किया॥
समय पर हम लोग आशुतोष के दफ्तर पहुँच गए और कैमरा टीम ने अपना काम शुरू कर दिया॥ समय का सदुपयोग करने के लिहाज़ से मैं और मेरे कार्यक्रम की निर्देशिका हम दोनों आशुतोष को अपने कार्यक्रम के बारे में विस्तार से बताने में व्यस्त हो गए॥
सब कुछ ठीक ठाक था॥ और कैमरा सैट होते ही आशुतोष ने माइक लगाया और अपनी जगह पर विराजमान हुए॥ कि अचानक उन्हें ख्याल आया की इस कार्यक्रम का नाम तो "बॉलीवुड इंक" है॥ और वो कैसे किसी ऐसे कार्यक्रम का हिस्सा बन सकते हैं जिसमें हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्री को "बॉलीवुड" कह कर संबोधित किया जा रहा हो??
बस फ़िर क्या था आशुतोष ने हमसे कुछ पल की इजाज़त मांगी और उसके बाद हमें अपने निर्णय से अवगत करवाया की वो इस कार्यक्रम में हिस्सा नही लेंगे॥ या तो कार्यक्रम का नाम बदला जाए और या उन्हें इसमें बोलने के लिए मजबूर न किया जाए॥ ऐसे में आधा दर्जन लोगों की टीम कैमरा, लाइट और बाकी साजो-सम्मान के साथ वहां आशुतोष के दफ्तर में खड़ी ख़ुद को आला दर्जे का बेवकूफ महसूस कर रही थी॥ इस परिस्थिति का सामना करना मेरे लिए सबसे ज़्यादा कठिन था क्योंकि मैंने ही आशुतोष से बात करके उन्हें अपने कार्यक्रम और उसके विषय के बारे में अवगत करवाया था॥ काफी कोशिश की गई आशुतोष को यह समझाने की कि इस यूँ आखिरी मौके पे उनका इनकार हमारे लिये कई मुसीबतें खड़ी कर देगा॥ मगर फ़िल्म इंडस्ट्री में "प्रोफ़ेशनलिज़्म" का ढोल पीटने वालों में अग्रणीय आसुतोष अपने इरादों से टस से मस नही हुए॥ मगर जैसा कि हमारी इंडस्ट्री में एक प्रसिद्द कहावत है कि "द शो मस्ट गो ऑन".. और वो शो भी बना बस फर्क सिर्फ़ इतना था कि कुछ बड़ी मुश्किलों का सामना करने के बाद उस कार्यक्रम में आशुतोष कि जगह परिणीता फ़िल्म के निर्देशक प्रदीप सरकार ने फ़िल्म निर्माण के विभिन्न पहलुओं पर रोशनी डाली। और दर्शकों को मनोरंजक तरीके से कुछ ज्ञानवर्धक बातें बताने की हमारी कोशिश पुरी तरह कामयाब रही॥

मंगलवार, 5 जनवरी 2010

है कोई इनका वारिस ??

चारों तरफ़ मंदी की मार का शोर है॥ हर कोई परेशान है कि आखिर नौकरियां गई कहाँ॥ मगर मुझे ये सोच के ताज्जुब हो रहा है कि हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्री में आज भी कई पोस्ट सालों से खाली हैं जिनका कोई भी उम्मीदवार नहीं हैं॥ सोच के देखिये कि हर दूसरी फ़िल्म में पुलिस इंसपेक्टर का किरदार निभाने वाले कलाकार की कुरसी जोकि जगदीश राज के निधन के बाद खाली हो गई थी क्या आजतक उसका कोई दावेदार हमारी इंडस्ट्री में पैदा हुआ?? डांसिंग क्वीन हेलन के बाद आज कौन है जो "मोनिका ओ माय डार्लिंग" कि धुन पर बेपरवाह थिरक सके?? और अमेरिकी राष्ट्रपति ओबामा को जीता कर विश्व इतिहास रचेयता का श्रेय पाने वाले महावीर बजरंगबली कि भूमिका को अपने ही एक अलग शाही पंजाबी अंदाज़ में निभाने वाले दारा सिंह की पदवी का भी कोई वारिस दूर-दूर तक दिखाई नही देता॥ खैर जिन लोगों के नाम मैंने लिए उनसे आप सभी परिचित हो ये ज़रूरी नही है॥ तो चलिए इन सभी को ज़रा करीब से जानने कि कोशिश करते हैं हो सकता है मेरी इस कोशिश के बाद कोई इस और ध्यान दे और शायद इनकी जगह लेने का सपना किसी के मन में जागने लगे॥

तो लेडीज़ फर्स्ट के नियम कि अवहेलना न करते हुए शुरुआत करते हैं ५०, ६० और ७० के दशक में हिन्दी फ़िल्म के दर्शकों को अपना नाम "चिन चिन चुंग" बता कर सबका मन मोहने वाली हेलन रिचर्ड्सन से॥ जिन्हें हम सब सिर्फ़ हेलन के

नाम से ही जानते हैं॥ यूँ तो हिन्दी फिल्मों में हेलन का नाम बतोर खलनायिका, सह-अभिनेत्री और मुख्य अभिनेत्री यानि हर रूप में हम देखते आए हैं मगर हेलन को आज भी हिन्दी फिल्मों की सबसे ज़्यादा मशहूर आइटम ग


हेलन के बाद
र्ल के रूप में ही याद किया जाता है॥ क्योंकि करीब ३०० फिल्मों में अपनी बेहतरीन अदाकारी का जादू चलने वाली हेलन ने ६५ से भी ज़्यादा फिल्मों में सिर्फ़ और सिर्फ़ आइटम सोंग के लिए ही अपनी मुह दिखाई की थी॥

मुझे याद आ रही है मुंबई पुलिस की॥ ६० व् ७० के दशक में अगर किसी हिन्दी फ़िल्म में पुलिस ऑफिसर का किरदार निभाने कि बात आती तो उसके लिए स्क्रीन टेस्ट या या ज़्यादा सोच-विचार करने कि शायद ही नोबत आती होगी क्योंकि इस भूमिका को बार -बार निभाते हुए जगदीश राज इस कदर टाइप हो चुके थे कि शायद उन्होंने भी किसी फ़िल्म का ऑफर आने पर ये पूछना छोड़ दिया होगा की फ़िल्म में उनका किरदार क्या है?? यही वजह है कि करीब २३६ फिल्मों में से १४४ बार जगदीश राज सिर्फ़ पुलिस इंसपेक्टर कि भूमिका में ही दिखाई दिए॥ जोकि अपने आप में एक विश्व रिकॉर्ड है॥

और अब बात करते हैं पंजाब दे पुत्तर रुस्तम-ऐ-हिंद दारा सिंह की॥ दारा सिंह जिनका नाम सुनते ही फ़िल्म और टेलीविजन पर उनके द्वारा साकार पवन पुत्र हनुमान का किरदार अपनेआप ज़हन में घूमने है॥ और शायद ये कहना ग़लत नही होगा कि दारा सिंह का नाम अब फिल्मी हनुमान जी के किरदार का प्रयाय्वाची बन चुका है॥ हालाँकि उनकी इस पदवी पर उनके सुपुत्र विदु ने कुछ वर्षों पहले अपनी

दावेदारी साबित करने कि कोशिश कि थी मगर पिता की लोकप्रियता के सामने बेटे की छवि का कद्द बोना साबित हुआ॥ दारा सिंह ने अबतक तक़रीबन १२० से भी ज़्यादा फिल्मों में अपनी अदाकारी का योगदान दिया है पर उनका सबसे बड़ा योगदान रहा धार्मिक हिन्दी फिल्मों में निभाई उनकी अलग-अलग भूमिकाएं॥ गौरतलब है कि अपने अब तक के अभिनय सफर में वह ५ बार बजरंगबली, 4 बार भीम, ३ बार भगवन शिव और एक बार भीम पुत्र घटोत्कच का किरदार निभा चुके हैं॥ मगर आज भी बजरंगबली के फिल्मी अवतार का नाम आते ही दारा सिंह ही हनुमान रूप दिखाई देने लगते हैं॥

ये जीतनी भी खाली पोस्ट के बारे में मैंने आपको जानकारी दी है इनके शहंशाहों ने वर्षों पहले ही अपने सिंघासन को खाली कर नई पीढी को उस पर विराजने का निमंत्रण दे दिया॥ मगर आज इतने सालों के बाद भी उस सिंघासन पर बैठना तो दूर कोई उस पायदान की पहली सीडी पर भी पाँव नही रख सका है॥ जो भी हो मुझे नही लगता इन खाली पड़े सिंघासनों को कभी कोई वारिस मिलेगा॥

शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2009

राज ठाकरे जी, ये क्या हो रहा है??

जब से राज ठाकरे ने "मराठा वाद" का राग छेड़ा है तब से मैं मुंबई में चलने वाली हवाओं में एक अजीब सा परिवर्तन देख रही हूँ। चुनावों में राज ठाकरे की पार्टी का जिस तरह सुपडा साफ हुआ वो तो खैर होना ही था लेकिन उसके पहले ही टेलिविज़न जगत ने जैसे कसम खा ली थी की अब सारे उत्तर-पूर्वी भारत को मुंबई में ला बसाना है। नतीजतन एकाएक बिहारी, पंजाबी, गुजरती, हरयाणवी, बंगाली कहानियों का एक हजूम सा टेलीविजन धारावाहिकों में उमड़ पड़ा है। और इस नई परम्परा के चलते उत्तर-पूर्वी भाषाओँ में पकड़ रखने वाले कलाकारों को मानो दूरबीन के द्वारा ढूँढा जा रहा है। बच्चों से लेकर बूढों तक के किरदार के लिए कहीं बिहारी तो कहीं हरयाणवी, पंजाबी, गुजराती कलाकारों की चाँदी हो रही है। हर एक चनैल अपने-अपने प्राइम टाइम को और ज़यादा कमाऊ पूत बनाने के लिए उत्तर-पूर्वी भारत के परिदृश्य पर आधारित कहानियों, किरदारों और भाषा का तड़का लगाने में व्यस्त है। कलर्स टीवी पर जहाँ एक और "बालिका वधु" राजस्थान की सुनहरी रेत पर अपनी सफलता का इतिहास रच रही है वहीं "न आना इस देस लाडो" में सभी कलाकार हरयाणवी तेवरों से दर्शकों का मन मोह रहे हैं। एनडी टीवी पर "बंदिनी" ने गुजरात से अपना रिश्ता जोड़ लिया है तो ज़ी टीवी का बहु चर्चित धारावाहिक "छोटी बहु" में बनारस के घाट अपनी लोकप्रियता के परचम लहलहा रहे हैं। "अगले जनम मोहे बिटिया ही कीजो" की बिटिया ने राज ठाकरे के कट्टर दुश्मन बिहार की चुनरी ओढ़ के दर्शकों के दिलों में अपनी जगह बना ली है। यानि कुल मिला के जो चमत्कार टेलिविज़न के इतिहास में आज तक नही हुआ वो इत्तेफाकन अब हो रहा है। जी हाँ ये सब महज़ एक इतेफाक ही है मगर दिलचस्प इतेफाक कि जैसे ही राज ठाकरे ने "मराठा वाद" कि भट्ठी सुलगा के अपने राजनितिक कैरिअर कि रोटियां सकने का बंदोबस्त किया वैसे ही टेलीविजन पर "अनेकता में भी एकता की मिसाल" भारतीय संस्कृति का देस राग गूंजने लगा। जिसका हर एक सुर इतना सधा हुआ है कि आने वाले कई वर्षों तक ऐसे-ऐसे एक सहस्त्र राज ठाकरे मिल कर भी नाखून को मांस से अलग नही कर सकेंगे। जिन छोटी छोटी रियासतों को जोड़ कर अखंड भारत की नीव रखने वाले सरदार वल्लभ भाई पटेल ने "आयरन मैन" यानि लोह पुरूष का खिताब जीता था उस अखंड भारत की नीव को हिलाना किसी राज ठाकरे जैसे कलयुगी "जयचंद" के बस कि बात नहीं। इसलिए हर एक नेता को अभी से ये सबक ले लेना चाहिए कि भारतीय लोकतंत्र का मखोल उड़ने के दिन अब लद गए हैं। जनता का दिल जितने की एक ही "मास्टर की" है और वो है निस्वार्थ समाज सेवा। तो जो जो "नेता गण" भारत भाग्य विधाता बनने का सपना पाल रहे हैं वो अभी से निस्वार्थ सेवा का रास्ता अपना लें तो अगले चुनाव में उनकी जीत का विश्वास मैं उनको दिलाती हूँ।
राज ठाकरे की पूर्व कारिस्तानियों से सम्बंधित एक और लेख पड़ने के लिए यहाँ दिए गए लिंक पर जायें:

http://kashmir-timemachine.blogspot.com/2009/01/w-hen-i-was-thinking-of-going-to-bed.html

शुक्रवार, 3 जुलाई 2009

कारगिल युद्घ और दोराहे पर खड़ी ज़िन्दगी..

पत्रकारिता एक ऐसा जगत है जहाँ जितना भी अच्छा काम कर किया जाए मगर समाज के हरेक एक तबके को आप संतुष्ट और खुश कर सको ये सम्भव नहीं है। लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ पत्रकारिता का सबसे बड़ा उसूल और मकसद सिर्फ़ सामाजिक बुराइयों से पर्दाफाश करना ही नहीं होता बल्कि यदि एक पत्रकार चाहे तो उसकी कलम बेसहारों या बेगुनाहों को न्याय दिलाने केलिए ब्रह्मस्त्र का भी काम कर सकती है।
लेकिन क्या होता है तब जब स्वयं एक पत्रकार परिस्थितियों के चक्रव्यूह में फँस जाता है। ये सच है कि अक्सर पत्रकारों की ज़िन्दगी उन्हें दोराहे पर खड़ा कर देती है जहाँ कर्तव्य और इंसानियत में से एक का चुनाव करना किसी दोधारी तलवार पर चलने से कम नहीं।
पर शायद ज़िन्दगी इसी का नाम है। इन्सान को हमेशा दोराहे पर खड़ा करने की आदत है ज़िन्दगी को। दो ग़लत रास्तों में से मुनासिब और दो सही रास्तों में से बेहतर का चुनाव ही ज़िन्दगी है। कारगिल की लडाई के दोरान ऐसे ही दोराहे पर खड़े पत्रकार की आपबीती पढ़ कर मुझे भी लगा कितनी आसानी से हमलोग 'मीडिया' या इसमें काम करने वाले लोगों की आलोचना करते रहते हैं मगर पत्रकार भी एक इंसान होता है और कई बार उसका ज़मीर भी कर्तव्य निर्वाह में उसका साथ देने से इंकार कर देता है॥

पत्रकार का संस्मरण पढने केलिए यहाँ क्लिक करें....
http://kashmir-timemachine.blogspot.com/2009/07/lt-saurabh-kalia-story-behind-his.html

रविवार, 19 अप्रैल 2009

टीआरपी बढ़ रही है पर कृष्ण जी नहीं..

मुरली मनोहर, कृष्ण कन्हैया, नन्द किशोर, रणछोर, गोविन्द, गोपाल, माखनचोर और भी न जाने कितने नाम हैं माँ यशोदा के लाडले कृष्ण कन्हैया के। उस बंसीधर को आज एक नाम मैं भी दे रही हूँ और उनका ये नया नाम है "टीआरपी चोर"। जी हाँ जब से इस नन्हे नटखट का अवतरण कलरस चैनल पर हुआ है तभी से इन्होने बाकी सिरिअल की "टीआरपी" पर चुपके से हाथ साफ करना शुरू कर दिया था। मगर गोकुल के कृष्ण कन्हैया को माखन चुराने में ख़ुद कोई नुक्सान नही उठाना पड़ा था जबकि यहाँ उन्हें "टीआरपी चोर" बनने के बाद अच्छी-मशकत करनी पड़ रही है। और सबसे बड़ा हर्जाना ये है की बढती "टीआरपी" के चलते उनकी उम्र बढ़नी लगभग बंद हो चुकी है। अब नतीजा ये की लीलाधर ने अपनी जिन लीलाओं का आनंद किशोरावस्था में लिया और अपने भक्तों को दिया उन्हें भी वह बाल्यावस्था में ही अंजाम दे रहे हैं। फिर वो चाहे देवराज इन्द्र का मान मर्दन करने के लिए गोवर्धन पर्वत को अनामिका पे उठाना हो या फिर गोपियों के वस्त्र हरण की लीला करनी हो ये सभी काम बढती "टीआरपी" के चलते उनसे बाल्यावस्था में ही करवाए जा रहे हैं॥
इसमें कसूर किसका है ?? क्या साढ़े तीन साल की धृति भाटिया की बेमिसाल अभिनय क्षमता को इसका जिम्मेदार ठहराया जाए या फिर इस बेरहम टीआरपी के खेल को जिसने आज के दौर में हर चैनल और सीरियल निर्माताओं को "इन्सिक्योर" कर दिया है जिसका नतीजा ये कि ये लोग सालों तक एक ही पुरानी बोतल का ढक्कन बदल बदल कर दर्शकों को बेवकूफ बनाते रहते हैं मगर कुछ नया कर पाने की हिम्मत ये तब तक नही उठा पाते जब तक कोई "बालिका वधु" चुपके से दर्शकों के ड्राइंग रूम और दिल में घुसपैठ कर अपना स्थान सुनिश्चित नहीं कर लेती।
खैर हम बात कर रहे थे "टीआरपी चोर" की॥ इस बढती टीआरपी ने उनकी उम्र पर पहरे लगा दिए हैं। अब कंस की कारागार से निकलने केलिए तो देवकीनंदन ने अपनी "माया" का जाल बिछा के जेल के सभी पहरेदारों को सुला दिया था मगर यहाँ जो उनके पहरेदार हैं उन पर उनकी माया का उल्टा असर हो रहा है और वो लोग पुरी तरह चौकन्ने हैं की इस नन्हे टीआरपी चोर से जितनी हो सके टीआरपी की चोरी करवा ली जाए हैं। और इस काम ने उनकी रातों की नींद उड़ा दी है क्योंकि नन्ही धृति यानि कृष्ण से लाजवाब अभिनय करवाने केलिए पूरी टीम को खासी मशकत करनी पड़ती है। इस सिरिअल के निर्माता और निर्देशक केलिए सबसे बड़ी चुनौती है नटखट कृष्ण और मामा कंस के उन दृश्यों का फिल्मांकन करना जहाँ उन दोनों को एक साथ दिखाया जाता होता ई॥ क्योंकि धृति यानि अपने कृष्ण जी जितनी चपलता और सह्जता से कैमरे का सामना कर लेते हैं उतना ही डर उन्हें मामा कंस के सामने आने से लगता है॥ जिसकी वजह से मामा भांजे के एकसाथ दिखाए जाने वाले दृष्यों का फिल्मांकन अलग अलग करके बाद में उन्हें तकनीकी सहायता के द्वारा एक साथ दिखाया जाता है॥
चलो बढती टीआरपी को बनाये रखने केलिए इस समस्या का समाधान तो निकाल लिया मगर मुझे डर सिर्फ़ एक बात का है की महाभारत के इस मुख्य नायक ने कुरुक्षेत्र में जो "गीता" का उपदेश दिया था उसकी जिम्मेदारी भी कहीं नन्ही धृति को ही न उठानी पड़े। पर क्या हमारे दर्शक उस हद्द तक बेवकूफ बनने केलिए तैयार हैं??

मंगलवार, 7 अप्रैल 2009

प्रजातंत्र, चुनाव और जूता..

सुना है की कल असम में कोई बम्ब ब्लास्ट वगैरह हुआ था॥ और कोई ८-९ लोग मारे भी गए थे॥ टीवी तो मैंने कल भी देखा था मगर शायद मीडिया उस ख़बर से ज़यादा प्रभावित नही हुआ इसलिए मीडिया की भट्टी असम ब्लास्ट के अंगारे ज़्यादा गरम नही हुए॥ ये भी मुझे आज पता चला॥ अपने के पी एस गिल साहब से द्वारा॥ अभी अभी जब वो आज की सबसे बड़ी ब्रेकिंग न्यूज़ "गृह मंत्री पर चला जूता" के बारे में अपनी निष्पक्ष राय टीवी पत्रकारों को दे रहे थे॥ तब उन्होंने इस जूतागिरी के नए फैशन की निंदा की और साथ ही एक अहम् सवाल उठाया की इस जूतेके पीछे पूरा मीडिया समाज क्यों जुटा हुआ है॥ इतनी हलचल मीडिया में कल क्यों नही हुई जब असम में बम्ब ब्लास्ट हुआ?? कई लोग ज़ख्मी हुए और मारे भी गए??
सच में अगर यह कल की घटित घटना है भी तो इस दुर्घटना से ज़्यादा कल आम दिनों की तरह ही हर टीवी चैनल आने वाले चुनावों के प्रति ही समर्पित दिखाई दिया॥ अरे हाँ कुछ एक चैनल तो राजनेताओं की तिजोरियों का लेखा-जोखा दर्शकों के सामने पेश कर समझ रहे थे कि लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहलाने का उनका उत्तरदायित्व पूरा हुआ॥ इतना कर देने से जनजागृति की मशाल जल उठेगी और आने वाले चुनावों में कोई चमत्कार होगा॥ और शायद दूर किसी अन्य लोक से कोई नई सरकार ज़मीं पर उतर आएगी॥ जो बोट द्वारा मुंबई में घुसपैठ कर आतंक का नंगा नाच खेलने वालों और पड़ोसी देश में बैठे उनके आकाओं के खिलाफ आखरी और निर्णायक कदम उठाएगी॥
क्या हर बार नेताओं की जमा पूंजी का ब्यौरा जनता को देने से और "एक्जिट पोल" पर आधारित कुछ एक समय गवाओं कार्यक्रम प्रसारित करने से हमारा लोकतंत्र को एक सही दिशा और सरकार मिल जायेगी??
क्या मीडिया का ये फ़र्ज़ नही के वो चुनाव से पहले हर नेता की "टेरीटरी" में जायें और वहां की जनता से पूछे कि क्या पाँच साल पहले उनसे किए गए वादे पुरे हुए हैं?? पिछले पाँच सालों में इलाके के नेता ने कितनी बार अपना चेहरा जनता को दिखाया है?? किस नेता के इलाके में उन्नति हुई और कहाँ की जनता के दामन में आज भी सिवाए आक्रोश के और कुछ नही है?? संसद में किस नेता की हाज़री कितनी रही??
क्या फरक पड़ता है सरकार चाहे भाजपा की हो या कांग्रेस की?? देश में भिखारिओं का बिसिनेस और उनकी संख्या बढाती रहेगी, सरकारी स्कूलों के नाम पे चलने वाली बिना पहिये की बैलगाडी की हालत बद से बदतर होती रहेगी, अल्प संख्यकों के नाम पर होने वाली राजनीति में दो चार नए मुद्दे जुड़ते रहेंगे, पेट्रोल का दाम बढ़ता रहेगा और रुपये की कीमत डॉलर के मुकाबले कम होती रहेगी, आतंकवाद और कश्मीर के मुद्दे तो हर सरकार की पाली हुई रखैल पहले भी थे तब भी रहेंगे॥ इसके बिना किसी भी राजनितिक दल का न तो पकिस्तान में गुज़ारा है ना ही भारत में॥ क़र्ज़ और महंगाई के मारे किसान खुदकुशी करते रहेंगे॥ ८४ के दंगो में ६००० से ज़्यादा नरसंहार करवाने वालों को २४ साल बाद चुनाव से ठीक पहले क्लीन चिट मिलती रहेगी और "जरनैल सिंह" जैसे पत्रकार ख़ुद अपने ही समाज का देश की सरकार के हाथों चिर हरण होता देख एक-आधा जूता किसी गृह मंत्री पे फेंके अपनी बेबसी का इज़हार करते रहेंगे और हम ब्लॉग लिखने वाले अपने कंप्यूटर बैठ कर अपने दिल और दिमाग में उठते तूफान को ऐसे ही किसी पोस्ट में लिख कर फिर अगले विषय के बारे में सोचते रहेंगे॥ और प्रजातंत्र चुनाव और जूतों का खेल यु ही चलता रहेगा॥




Picture Courtesy: http://www.allvoices.com

मंगलवार, 24 मार्च 2009

हिन्दी में ब्लॉग : आख़िर क्यों ??

ये नया हिन्दी ब्लॉग शुरू करते वक्त ही मेरे दिमाग में ये बात उठी थी की मुझे इस सवाल का जवाब कई बार देना होगा॥ हिन्दी में एक ब्लॉग क्या शुरू कर दिया मानो ये एक सवाल जी का जंजाल बन गया है॥ कुछ टिपण्णयों पर ग़ौर फरमाइए--क्या फायदा ऐसी भाषा में ब्लॉग लिखने का जिसे पढ्नेवाला ही कोई न हो?? या फिर लगता है दिल्ली की याद कुछ ज़्यादा ही सताने लगी है??
मैंने भी सोच रखा था कि मेरा जवाब इसी ब्लॉग पर मिलेगा सबको॥ तो सवाल है कि आख़िर हिन्दी में ब्लॉग क्यों?? सबसे पहली बात मैंने भारत यानि हिंदुस्तान में जन्म लिया है और बचपन से ही मुझे सिखाया गया कि हिन्दी मेरी मातृभाषा है॥ आजभी हिंदुस्तान के करीब ७०% लोगों केलिए हिन्दी ही आपसी बोलचाल का एकमात्र ज़रिया है॥ अब अगर मेरा मन किया कि मैं अगर बचे हुए ३०% लोगों कि श्रेणी में ख़ुद को रखते हुए बाकि ७०% हिन्दी जनमानस का साथ निभाती रहूँ तो इसमें आख़िर बुरा क्या है??
जैसा कि श्रीमान वरिष्ठ बच्चन साहब, सीधी सरल भाषा में बिग "बी" यानि अमिताभ बच्चन के बारे में भी मैंने सुना है की वो यदा-कदा अपना ब्लॉग हिन्दी में भी लिखते हैं॥ इस बात को मीडिया ने फुटबाल की तरह उछाला॥ वो भी ये कहते हुए कि मातृभाषा को सम्मान और पहचान देने वालों में अगर अमिताभ सरीखे प्रसिद्द व्यक्ति का योगदान होगा तभी लोगों के मन में अपनी मातृभाषा के प्रति लगाव उजागर होगा॥ पर जैसे ही वो लगाव मेरे मन में उजागर हुआ तो कई लोगों का हाज़मा ख़राब हो गया॥ दरअसल मीडिया से एक चूक हो गई क्योंकि उन्होंने बच्चन साहब के हिन्दी में ब्लॉग लिखने कि ख़बर का प्रचार ग़लत तरीके से किया क्योंकि यदि बात को कुछ इस तरीके से कहा जाता के बिग "बी" न सिर्फ़ हिन्दी में ब्लॉग लिखते हैं बल्कि वो हिन्दी के ब्लॉग पढ़ते भी हैं तो शायद हिन्दी बोलने -लिखने-समझने में अपँग जनमानस को मेरा हिन्दी में ब्लॉग लिखना यूँ नागवार न होता और उनके मन में ये न उठते कि क्या फायदा ऐसी भाषा में ब्लॉग लिखने का जिसे पढ्नेवाला ही कोई न हो?? जो भी हो अब जब लिखना शुरू किया ही है तो इतना ख्याल मुझे भी रखना होगा कि मेरा ये खुमार महज़ एक हिन्दी बचाओ सप्ताह या हिन्दी पखवाडा बनके न रह जाए॥
हिन्दी भाषा के जानकारों के लिए मेरा इतना ही निवेदन है कि भाषा में गलतियाँ हों तो कृपया अपने मन की शान्ति भंग न किजिगा क्योंकि कई बार तकनीकी जानकारी के आभाव के कारण भी न होने वाली गलतियाँ हो जाती हैं॥ तो कृपया शान्ति का दान दें॥

गुरुवार, 19 मार्च 2009

बहु पिट चुकी अब बेटी की बारी..


देखिये सभी महिला मंडल और महिला अधिकार समितियों से मेरी गुजारिश है कि सिर्फ़ टाइट्ल पढके मेरे खिलाफ नारे लगाने से पहले पूरी बात जान लें.. ये वो पिटाई नहीं जहाँ लाठी, थप्पड़ या जूतों से पिटाई की जाए ये टीआरपी के जूतों से होने वाली पिटाई है॥ जहाँ न तो किसी के आंसू निकले हैं ना ही खून.. पर प्रोड्यूसर और चैनल को घटा होने पे दोनों खून के आंसू ज़रूर रोते हैं..

चलो अब मुद्दे की बात पे आते हैं की ये टीआरपी की पिटाई आखिर कौन सी पिटाई है॥ तो सुनिए क्योंकि सास भी कभी बहु थी, छोटी बहु, बड़ी बहु, मंझली बहु, तीन बहुरानियाँ वगैहरा-वगैहरा यानि इधर-उधर और दुनिया भर की बहुओं की जामात ने पुरे आठ तक साल हम लोगों के ड्राइंग रूम पे हुकूमत की॥ और वो भी एक २०" के डिब्बे के बलबूते पे॥ २०" का डिब्बा अरे वही इडिअट बक्सा, अपना टेलिविज़न॥
आखिरकार ये सरकार कभी न कभी तो गिरनी ही थी न॥ तो जी देश ने अपनी "एकता" दिखाई और बहुओं की टीआरपी गिरा के कर दी उनकी जम के पिटाई॥ पर हम सीरियल बनाने वाले भी कहाँ चुप बैठने वाले हैं॥ बस एक हुकूमत का तख्ता जनता ने पलटा तो हमने दूसरी को ला बिठाया लोगों के घरों में॥ अब ये दूसरी कौन ? नही जी हम यहाँ दूसरी बीवी या बहु की बात नही कर रहे ये दूसरी हैं टेलिविज़न पर नई सरकार बनानेवाली बेटियाँ.. ना आना इस देस लाडो, मेरे घर आई एक नन्ही परी, लाडली, अगले जन्म मोहे बिटिया ही कीजो.. इस सरकार के प्रमुख सदस्य हैं॥ और सदस्य भीआते रहेंगे॥ और कुछ सालों तक इस सरकार की हुकूमत सलामत रहेगी॥ अब सरकारें तो बदल गई पर परदे के पीछे की हकीकत वही की वही है..आज भी मेल कलाकारों से ज़्यादा फिमेल कलाकारोंको देसी घी में चुपडी और तड़का मार रोज़ी-रोटी मिल रही है.. क्योंकि बहु का किरदार हो या बेटी का निभाना तो किसी फेमेल कलाकार को ही पड़ेगा न.. यानि संसद में महिलाओं को 33% आरक्षण मिले या न मिले पर टेलिविज़न की सरकार की बागडोर महिलों के ही हाथ रहेगी.. वो तो गनीमत है के नेताओं का धयान इस तरफ़ नही गया वरना मायावती कीकोशिश होती के दलित कलाकारों को आरक्षण दो, राज ठाकरे मराठी कलाकारों को काम देने वाले निर्माताओं को ही फ़िल्म सिटी में शूटिंग करने देते॥ और अगर सभी राजनितिक दलों में किसी बात पे "एकता" होती तो वो ये के महिला कलाकारों की सीटें कम हो .. अगर ऐसा होता तो इन बहु-बेटियों का क्या होता ?? फिर शायद कुछ इस तरह के सीरियल दिखाई देते क्योंकि ससुर भी कभी दामाद था, बाल-दामाद, फिर आना इस देस लाडेसर, अगले जन्म मोहे छोरा ही कीजो॥
जो भी हो टीआरपी के जूतों से पिटाई तो इनकी भी होती.. वैसे ही जैसे बहुओं की हुई और देखना है की बेटियोंकी पिटाई कितने साल बाद होगी और फिर उसके बाद क्या?? फिर से बहुए या अगली बार कुछ और?? ज़रा सोचिये ..